परिवार ने समझी बचत – मेरा कोरोना वर्ष अनुभव56

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करोना अनुभव
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, लाकडाउन सुखद ही रहा कयी संदर्भों में मेट को न बुलाकर बढ़िया अनुभूति रही। आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बन गयी ।। अरसठवर्षीया बुढ़िया भी सारे दर्द भूलकर दौड़ने लगी । समय पर साफ-सुथरा काम होने लगा । मेट का इंतजार नहीं।
गरम-गरम दोफुलके पति को चिमटे से भागकर परोसने में जिस आत्मोल्लास का अनुभव हुआ वो शब्दों से परे हैं
एक रोटी साथ बैठकर खाना साथ साथ एक-दूसरे का सहयोग , पति का घर पर रहना आदि ने दाम्पत्य को एक नया आयाम दिया बच्चे अमरीका में ज्यादा ध्यान रखने लगे । दोनों समय वीडियो कालिंग और इंस्ट्रक्शन और अधिक करीब ले आया ।लगता है हम-दोनों के अब वे संरक्षक हो ग्रे हैं बड़ी बहू मेरी छह वर्षीया पौत्री से रोज बात कर मेरा मन बहलाती है
रोज यूट्यूब से देखकर नये नये व्यंजन बनाए ।बचपन की सारी हाबीज सामने आई ।अच्छा गाने लगी हारमोनियम जो बंद पड़ा था धीरे-धीरे बजाया ।
बहुत ऐक्टिव हो गई। अजीब सा सकारात्मक बदलाव आया । जिंदगी मस्त हो गई ।
बस एक बात मेरी छोटी बहू लाकडाउन में मेरी डेढ वर्षीया पौत्री के साथ इंडिया में फंसे गई । बेटा अमरीका में फंस गया फरवरी से । उसे बाद में आना था बहू पहले आ गई थी ।
बस पर बहू पौत्री के साथ मुझे साथ रहने का आनंद मिला ।बेटा बहुत पाज़िटिव है । वो आगे की आनलाइन पढ़ाई भी शुरू कर रहा है योग और व्यायाम हमारा पूरा परिवार करता है ।बहू भी खुश हैं हां वो पति से छहमाह से दूर है । मां होने के नाते मैं महसूस करती‌हू । नानफेमिली स्टेशन पर आर्मीअफसर की भी तो पोस्टिंग होती है बेटा बहू दोनों एक-दूसरे को समझा देते हैं ।
सबसे अच्छी बात घरखरच में काफी बचत है।

लेखिका- रंजना प्रमोद सैराहा