वैदिक मान्यताएं और जीवन- मेरा कोरोना वर्ष अनुभव 36

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ज्ञान! विज्ञान! विनाश!

मानव सभ्यता सबसे प्राचीन है। आदि मानव हमारे पूर्वज थे।एक अबोधमानव जिसे अपना तन ढकना भी नहीं आता था ,धीरे-धीरे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसने जीवन जीने के तरीक़े खोज निकाले तथा धीरे-धीरे सभ्य मानव की श्रेणी में आने लगा। प्राकृतिक शक्तियों, प्राणी जगत, आध्यतम से प्रेम करने लगा तथा संयमित जीवन जीने लगा। लेकिन जैसे जैसे हम विज्ञान के सम्पर्क में आए हमने सारी मर्यादित सीमाओं, आस्थाओं, परम्पराओं का परित्याग करके हम पश्चिमी सभ्यता संस्कृति का अनुकरण करने लगे जिसने उपभोक्तावाद को जन्म दिया।

हम प्रतिस्पर्धा के जाल में फँस गए। विश्व के देश अपनी साम्राज्यवादी भूख को मिटाने के लिए आणविक शक्ति का प्रयोग कर मानव सभ्यता संस्कृति को विनाश के गर्त में डालने को आतुर है। विज्ञान के पीछे हम अपने धर्म को भूल गए। प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने लगे।

और आज जब विनाश का भयानक मँजर विश्व पटल पर हम नंगी आँखों से देख रहे हैं तो हमें अंतर्मन के आहत कोने से एक निनाद सुनाई दे रहा है कि जीवन में एकांत का, आस्था का, श्रद्धा का, धर्म का, पारम्परिक बातों का , पुरानी जीवन शैली का, पौराणिक मान्यताओं का, वैदिक संस्कृति का , मंत्रों का, प्रकृति का, समाज का, परिवार का, राष्ट्र का, वनस्पति का, जंगलों का, प्राकृतिक उपादानों का, योग काहमारे जीवन में क्या महत्व है? ध्यान, त्याग, तपस्या से हम बड़ी से बड़ी आपदा पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।
इस एक छोटे से वायरस ने हमें संदेश दिया है कि वसुधेव कुटुम्बकम की भावना का पालन करें। जियो और जीने दो के रास्ते पर चलें। प्रकृति के सामने हम असहाय हैं अतः प्राकृतिक शक्ति का सम्मान करें जहाँ आणविक शक्ति का दुरुपयोग न हो तथा सर्वत्र शांति समरसता की अविरल धारा सतत प्रवाहमान रहे ताकि भारत माता भी अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य के सात्विक कार्यों को देखकर मानवीय सभ्यता पर अपना वरद हस्त बनाए रखें। जिंदगी और हमारा आचरण दोनों एक दूसरे के पूरक है, आचरण अचार व्यवहार और खान पान दोनों पर असर करता वही जीवन को प्रभावित भी करता , हम जैसा जीवन जिएंगे वही आचरण हमें वैसा दिखायेगा

सर्वे भवंतु सुखिंन: सर्वे संतु निरामया
लेखिका- आशा पुरोहित