कालचक्र की विडंबना – मेरा कोरोना वर्ष अनुभव 27

sakhi talk आ सखी चुगली करें

#कोरोना #अनुभव

यह कोरोना वर्ष तो मुझे बदलते युग सा प्रतीत हो रहा, कभी जिसकी कल्पना भी नहीं की थी, सबकी दुनिया ही बदल गई, सब लोग साथ रहते हुए भी दुरी बनाए हुए हैं , जैसे सब कुछ हमारी आत्मा मे दब कर रह गया हो, जो हमारे अपने दुर फंसे हुए हैं वो चाहकर भी नज़र के सामने नहीं आ सकतें, प्रभु ये कैसी विडम्बना है?
कोरोना वर्ष मे मै और मेरी डाय़री हमेशा साथ रहे यूँ मानिये चोली दामन का साथ है ।
कोरोना वर्ष मे जहाँ परिवार एक हुआ,वही सब कुछ सिमट भी गया,सांसे तो चल रही पर शरीर बेजान सा प्रतीत हो रहा, ये कैसा काल चक्र है?
कोरोना वर्ष मे मुझे कुछ अपनों से दूर भी रहना पड़ा, लेकिन ढेर सारी सखियाँ मुझे मिली जिनसे बहुत कुछ सिखने को भी मिला कुछ अनजान लोगों का स्नेह भी मिला ।
कोरोना वर्ष मे चारों तरफ सन्नाटा है, लेकिन दिलों दिमाग मे एक अजीब सी हलचल भी है अब यह हलचल थम जाए लेकिन अभी तक कुछ नहीं थमा इस महामारी ने किसी को नहीं छोड़ा न अमीर न गरीब, बस एक ही चीज सिखाया कि मत आना किसी के ज्यादा करीब अगर बढ़ी है तो दूरियां ही दूरियां, जाने किसकी नजर लग गई , हम सब की नजदीकियों को, कोरोना बहुत ही दुखदायी वर्ष रहा। कोरोना वर्ष का मेरा अनुभव बहुत ही विचित्र रहा।
यूँ ऐसा लग रहा है जैसे सारी ख़्वाहिशें दिल में ही दफन हो गई है न हीं नये कपड़े खरीदने का शौक न हीं पहनने का आखिर हम कहाँ जायेंगे, अगर कुछ दिखता है तो छत व जमीन।
जो कामवाले मजदूर थे, कामवाली बाइयाॅ थी उनके उपर तो मानों प्रकृति ने प्रहार ही किया हो। ये लोग भर पेट भोजन भी नहीं जुटा पाते होंगे ये सोचकर मन व्याथीत हो जाता है ।
ये तो अटल सत्य है कि सबको एक दिन जाना हैं, परन्तु वीभत्स होगा किसी को नहीं मालूम था ।
मेरी प्रभु से यही प्रार्थना है कि ऐसी सजा मत दीजिये ।कभी-कभी तो लगता है कि कहीं हम सब गुनहगार है, कहीं न कहीं कुछ गलतियाँ जरूर हुई होगी ।