सोचते कैसे हैं?

guru shishya

आप जो जानते हैं केवल उसी के बारे में सोच सकते हैं, आप कभी कल्‍पना कर सकते हैं कि हाथी के साइज का चूहा हो, लेकिन उसके बारे में सोच नहीं सकते, विचार नहीं कर सकते। विचार हम केवल उन्‍हीं बातों पर करते हैं जो हम जानते हैं, जानने की प्रक्रिया बहुत जटिल होती है, अधिकांशत: हम अपने परिवेश से जानते हैं। बचपन में घर से स्‍कूल तक का सफर भी बहुत से रहस्‍यों और उत्‍सुकता को समेटे हुए होता है, धीरे धीरे जब हम उन्‍हें जान जाते हैं तो उनके बारे में अलग से सोचना बंद कर देते हैं। यही बड़े होने पर एक सेट रूटीन में रहने पर होता है कि हमें सोचने के लिए भोजन नहीं मिलता।

इसकी कमी हम बाहरी माध्‍यम से पूरा करते हैं, इसमें किताबों, समाचारपत्र से लेकर यूट्यूब तक सभी शामिल है। स्‍वयंप्रकाशित माध्‍यम यानी मेनस्‍ट्रीम मीडिया आपको खुद आगे चलकर बताता है कि आपके सोचने अथवा विचार करने के क्‍या बिंदू होने चाहिए, लेकिन इंटरनेट की एक बड़ी खामी यह है कि यह आपको बताता नहीं है कि क्‍या पढ़ें, किसे जानें, कहां जाएं, यह बस आपके सामने एक टूल की तरह आता है और आपको ही इनपुट कर डाटा निकालना है और उसका विश्‍लेषण कर अपना मत तैयार करना है।

यह बहुत बड़ी समस्‍या है, अगर आप बहुत अधिक मानसिक रूप से सक्रिय नहीं हैं तो कुछ ही दिन में इंटरनेट से मन उचट जाएगा। इस कमी को पूरा किया सोशल मीडिया ने, उसने बताया कि आपके आस पास के लोग क्‍या सोच रहे हैं। अगर यह माध्‍यम प्रभावमुक्‍त रहता तो श्रेष्‍ठ था, लेकिन भेड़ों को हांकने वाले ग‍डरियों के लिए यह कठिन बात थी। सो पहले उन्‍होंने मेन स्‍ट्रीम मीडिया के जरिए सोशल मीडिया को हैंडल करने का प्रयास किया और बाद में सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर टूल तैयार किए और आपके सामने सिलसिलेवार सूचनाओं का स्रोत परोसा जाए, क्‍या ट्रेंड कर रहा है, यह सूचना अधिक महत्‍वपूर्ण हो गई।

विचार के स्‍तर पर जो क्रांति हो सकती थी, वह गड़रिए लील गए… अब भी वक्‍त है, इस बंधन को तोड़ा जा सकता है, बशर्ते आपको पता हो सोचते कैसे हैं।

कैसे सोचते हैं ???!!!!