या तो महायोगी बनें…

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अगर आपको लगता है कि 500 या 600 रुपए किलो के भाव मिलने वाला घी महंगा है, तो या तो आप हद से ज्‍यादा मासूम हैं या फिर अज्ञ।

एशिया के डेनमार्क की हैसियत रखने वाले बीकानेर जोन में भी दूध 25 से 30 रुपए प्रति लीटर के भाव मिलता है। अगर सही तरीके से घी निकाला जाए तो एक लीटर घी के लिए 30 लीटर दूध की खपत होती है और सहउत्‍पाद के रूप में करीब 50 लीटर छाछ बनती है। ऐसे में घी बनाने के लिए केवल रॉ मै‍टीरियल के रूप में 750 से 900 रुपए लगते हैं। इसके बाद दूध का दही जमाना और दही को मथकर मक्‍खन निकालना और मक्‍खन को तपाकर घी बनाना, यह पूरा प्रोसेस जोड़ने के बाद अगर उत्‍पादक का लाभ जोड़ा जाए तो सामान्‍य से सामान्‍य घी 1500 रुपए प्रतिकिलोग्राम से कम का नहीं होगा।

ऐसे में अगर आप 500 से 600 रुपए प्रतिकिलो का घी खा रहे हैं, तो उसमें फिलर भरे हुए हैं, यह फिलर किस प्रकार के हैं, स्‍वास्‍थ्‍य को कितना फायदा या नुकसान पहुंचा रहे हैं, इसकी कोई गणना नहीं कर सकता। हमारे बीकानेर में एक घी उत्‍पादक हुए हैं, उन्‍होंने घी बनाने की फैक्‍ट्री लगा रखी थी, अभी का पता नहीं, पहले उनकी दो फैक्‍ट्री जब सरकार ने सीज की तो उसमें भारी मात्रा में आलू और पैराफीन बरामद हुए। गाय एक भी नहीं थी।

आंखें मूंदकर हम केवल जहर पी सकते हैं, अगर आप शिव जैसे महायोगी नहीं है तो शरीर का नष्‍ट होना तय है।

अच्‍छा आपने गौर किया रोजाना हजारों लीटर घी बनने के साथ बनी हुई छाछ का कहीं नामोनिशान क्‍यों नहीं है???

कृपया बताइए ना…

आपके शहर का फूड इंस्‍पेक्‍टर कौन है? 
क्‍या आपने कभी फूड इंस्‍पेक्‍टर को कोई शिकायत की है? 
क्‍या फूड इंस्‍पेक्‍टर द्वारा की गई नियमित विजिट का कोई ब्‍यौरा है? 
खाद्य उत्‍पादों को लेकर फूड लाइसेंस क्‍या कहता है?

अच्‍छा थोड़ा स्‍पष्‍टीकरण

फैट, फैट होता है : चर्बी, तेल, घी, क्रीम आदि रूपों में, घी, घी होता है : देसी गाय के दूध से जमे दही का मक्‍खन निकालकर तपाने से मिलता है। दोनों को एक दूसरे से रिप्‍लेस नहीं कर सकते।

हैवी मैटल

चिकित्‍सक बताते हैं कि हमारे शरीर में ऐसा कोई तंत्र नहीं है जो हैवी मैटल को शरीर में घुसने के बाद वापस बाहर निकाल सके। एल्‍युमीनियम हैवी मैटल है, एक बार शरीर में गया तो गया, बाद में अधिकांशत: दिमाग को नुकसान पहुंचाता है। अधिकांशत: डिमेंशिया और अल्‍जाइमर्स रोग के लिए आधारभूमि तैयार करता है।

एल्‍युमीनियम ने सिल्‍वर बर्तन के नाम से हमें सस्‍ते बर्तन को मुहैया कराए, लेकिन बदले में हमारा तंत्रिका तंत्र खा रहा है। आपकी रसोई में कड़ाही और प्रेशर कुकर आवश्‍यक रूप से एल्‍युमीनियम के ही होंगे। बड़े जीमण में अधिकांश टोप और पकाने के बर्तन एल्‍युमीनियम के होते हैं।

कितना एल्‍युमीनियम होगा आपके शरीर में… (अगर आप यह सोचते हैं कि सरकार क्‍या कर रही है इस बारे में तो वास्‍तव में एल्‍युमीनियम का असर शुरू हो चुका है 😉 )