मेरा कोरोना वर्ष अनुभव

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मैं प्रीतम मेहता कोठारी अपना कोरोना का अनुभव शेयर कर रही हूं जो मैंने अपने पतिदेव से दूर रहकर कुछ खट्टे मीठे पलों के साथ बिताया….

मेरे कोरोना का सफर शुरू हुआ 19 मार्च से बहुत खुश थी अपनी माँ से मिलने जो जा रही थी 19 की सुबह सूरत घर से रवाना हुई और शाम होते मैं अपनी माँ के पास बेंगलुरु थी खुशी का ठिकाना नहीं था माँ से मिलने की आरजू थी…

पर यह क्या एक ही दिन बाद जनता कर्फ्यू का ऐलान हो गया कोई ना …मन को समझाया सात आठ दिन की बात है 29 मार्च को तो वापस सूरत जाना ही है… तभी एक-दो दिन में ऐलान हुआ सारी विमान सेवाएं निरस्त कर दी गई है मेरा तो यह हाल था काटो तो खून नहीं… क्योंकि मैं आज से पहले अपने पियर में ज्यादा रही नहीं थी और मेरे पति देव पीछे अकेले थे होटल रेस्टोरेंट सारे बंद.. तो खाने की चिंता अलग से.. उन्हें कुछ बनाना भी नहीं आता था।

ऐसे मे एक उम्मीद की किरण नजर आई और कहीं से उनकी टिफिन की व्यवस्था हो गई तब जाकर दिल को चैन आया…

पर भीतर से मन अस्त व्यस्त था लॉकडाउन आगे से आगे बढ़ता जा रहा था और मेरे घर जाने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी तब अपने दिल को समझाया और शुरू हुआ मेरी भाभी के साथ किचन में नए नए आइटम बनाने का सिलसिला…. कभी एक कटोरी मैदा …कभी एक कटोरी घी… तो कभी एक कटोरी चीनी के साथ नए-नए प्रयोग किए गये और भाभी ने भी मेरे से बहुत कुछ सीखा…. और मुझे भी कुछ नया सीखने को मिला नए नए आइटम देखकर परिवार वाले खुश थे सो अलग… लॉकडाउन में भी बच्चों की नई-नई फरमाइश चालू रहती थी और मार्केट में सामान का टोटा… फिर भी हम लोगों ने जैसे तैसे मैनेज किया और इसी कशमकश के बीच डेढ़ महीना पूरा हो गया… लेकिन सरकार की तरफ से ना तो बस सेवा, ना ट्रेन सेवा और ना ही विमान सेवा चालू की गई ।बस आश्वासन था कि बहुत ही जल्दी चालू हो जाएगा सब कुछ पहले जैसा नॉर्मल हो जाएगा लेकिन होना नहीं था…..

इसी दौरान एक खबर आई अगर आप अपनी प्राइवेट गाड़ी से जाते हो तो सरकार आप को इजाजत दे रही है बस कोशिश चालू हुई पास निकलवाने की…. एक-दो दिन की मशक्कत के बाद आखिर पास मिल गया…. और बेंगलुरु से सूरत तक का 1300 किलोमीटर का सफर मैंने अपने बेटे के साथ अकेले ही पार कर लिया । चिंता थी कहीं कोरोना ना हो जाए इतने लंबे सफर में कुछ अनहोनी ना हो जाए पर ऊपर वाले का शुक्रिया हम सही सलामत दूसरे दिन अपने परिवार के साथ थे…और खुशियों का माहौल था…

लेखिका- प्रीतम कोठारी