दुःस्वप्न की तरह बीता समय – मेरा कोरोना वर्ष अनुभव 57

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सखियों,
2020 जब शुरू हुआ तो लगा जैसे क्रिकेट मैच शुरू हो रहा है ।बड़ा ही रोमांचक नंबर था ये। लगा 2020 मैच की तरह जल्दी ही खत्म हो जाएगा। पर ऐसा हुआ नहीं, अब तो यह द्रोपदी के चीर जैसा लगने लगा है। भागती- दौड़ती जिंदगी अचानक थम सी गई । शुरू में अच्छा लगा पूरे परिवार को एक साथ रहने का अवसर मिला ।पति बच्चे सब खुश थे ।रसोई में भी नित- नए पकवानों की खुशबू उड़ती थी। मगर जल्द ही चारों तरफ कोरोना का भय समाने लगा ।जिंदगी सहम सी गई। यद्यपि अपने करीबी परिजनों और करीबी मित्रों में अभी कोई कोरोना की चपेट में नहीं आया था किंतु फिर भी बहुत से लोगों ने अपने लोगों को खोया या उनकी बीमारी में वह बेहद परेशान रहे। फिल्म इंडस्ट्री ने भी इस वर्ष अपने अमूल्य नगीनों को खोया। लोगों के सामने रोटी और रोजगार की समस्या आन खड़ी हुई। धीरे-धीरे हर तरफ त्राहि-त्राहि मच में लगी ।फिर भी हमारा जीवन शांत निर्बाध चल रहा था। पर अचानक ही मेरे साथ भी ऐसी घटना घटी कि मैं 2020 को कभी भूल नहीं पाऊंगी और यह मुझे दुस्वप्न तरह हमेशा याद रहेगा। अप्रैल माह में जब लोक डाउन फर्स्ट ही चल रहा था। मेरे मायके से फोन आया कि मेरे पिता की तबीयत खराब है उन्हें लंग्स में पानी भरने की शिकायत हो गई थी। हम दो भाई- बहन हैं। माता- पिता के साथ मेरा छोटा भाई और भाभी रहते हैं ।पर लोक डाउन की वजह से मैं वहां नहीं जा सकी और मेरा भाई भी उसी शहर में उनका ट्रीटमेंट करवा रहा था। किंतु वहां के डॉक्टरों से हम सब असंतुष्ट थे ।क्योंकि कोई भी ठीक से देख नहीं रहा था और पिताजी की तबीयत में कोई पॉजिटिव फर्क नहीं पड़ रहा था। अंततः बड़ी मुश्किल से मैं अपने शहर से परमिशन लेकर वहां पहुंची ।वहां जाने के बाद हम दोनों भाई बहनों ने बड़ी मुश्किल से पिताजी के इलाज के लिए प्रशासन से दूसरे शहर में जाने की परमिशन ली। हम राजधानी जयपुर में पिताजी का इलाज करवा रहे थे, किंतु कोरोना के चलते वे लोग मरीज को एडमिट नहीं कर रहे थे ।इस तरह हमारे शहर से जयपुर तक हम दोनों भाई बहनों की कितने ही चक्कर लगे ।हमें लग रहा था कि पिताजी का ठीक से वहां भी इलाज नहीं हो पा रहा है और कोरोना ही इसकी सबसे बड़ी वजह है कि स्टाफ हर मरीज को हाथ लगाते डरता है ।लॉकडाउन और कोरोना काल की वजह से हम न पिताजी को दिल्ली ले जा सके,और ना मुंबई ,कई प्रदेशों की सीमाएं भी इस समय सील थी ।आखिरकार हमने हमारे पिताजी को 23 जून को खो दिया। मुझे लगता है कि अगर कोरोना का यह कॉल नहीं होता तो हम शायद उन्हें बेहतर चिकित्सा दिलवा पाते और उन्हें बचा सकते थे। मैं और मेरा परिवार इस साल को कभी नहीं भूलेंगे ।यह हमें एक ऐसा दर्द दे गया है जो भुला सकने योग्य नहीं है।

लेखिका –  Rekha Pancholi
Kota, Rajasthan.