जीवन के पहलू – मेरा कोरोना वर्ष अनुभव 18

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आतंकवादी सा प्रतीत

एक एम्बुलेंस साइरन बजाते हुए गली में आती है ।और उसके पीछे 2-3 पुलिस की गाड़ीयां 5-6 मोटरसाइकिल पर 8-10 लोग। सभी उसी घर के आगे जाकर रूकती है जहां वो आंतकवादी (कोरोना ग्रस्त व्यक्ति) मानो छुपा हुआ बैठा था । जो दिल्ली से कुछ दिन पहले ही आया था । गली में सभी के खिड़की- दरवाजें बंद है । पुलिस उसे लाउड-स्पीकर पर आवाज लगाकर बाहर बुलाती है । जैसे कोई संगीन जुर्म कर फरार हो । साथ ही गली के अन्य सभी लोगों को चेतावनी देते हुए सूचना देती है कि आपके गली में कोरोना पाॅजिटीव आया है.. कोई भी अपने घर से बाहर नहीं निकलेगा… यदि कोई बाहर पाया गया तो कठोर कार्यवाही की जाएगी । इन सभी के बीच जैसे ही वो व्यक्ति घर से बाहर आता है सभी उस व्यक्ति से दूर-दूर होते नजर आने लगते है । जैसे वो व्यक्ति कोई धारदार हथियार के साथ आकम्रण करने के उददेष्य से बाहर आ रहा हो । फिर वो चुपचाप एम्बुलेंस में जाकर बैठता है… और एम्बुलेंस उसे लेकर चली जाती है। जिसके बाद उसके घर पर नोटिस चस्पा कर सील की भांति कर दिया जाता है। जब यह चीन में था तब तक यह वायरस हास्यात्मक व्यंगय लग रहा था क्योंकि वहां सरकार द्वारा हाथ मिलाकर “हैलो” न करके सिर्फ नमस्ते की शैली पर जोर दिया जा रहा था । जो भारत की परम्परा को अन्य देष में स्पष्ट छवि उजागर कर रहा था । लेकिन इस व्यंगय ने बहुत कम समय में हमें व्यंगय बना कर छोड़ दिया । हमारे सभी सदस्य घर पर एकसाथ तो थे लेकिन उनके चेहरों पर हमेषा वाली रौनक नहीं थी । क्योंकि दिन भर टीवी में इस बीमारी को लेकर कई प्रकार के समाचार में किसी जाति जमात के द्वारा ये बीमारी फैलना होना बताया जा रहा था जिससे उस जाति के प्रति द्धन्द भावनाएं प्रतीत हो रही थी । शायद कही न कही मेरे भी मन में भी घृणा सी हो रही थी । लेकिन आज मुझे लग रहा है कि यह बीमारी जातिगत नहीं बल्कि प्रकृति से खिलवाड़ का नतीजा सा है ।

सकारात्मक पहलू

इस दौरान सबसे अच्छा दुरदर्षन पर रामायण का प्रसारित होना अपनेआप में सकारात्मकता का संचार था । जो इस समय परिवार के हर सदस्य को एक जगह बांधकर रखने में सहयोगी था । परिवार में सीमित साधनों में भी संतोष की प्राप्ति थी । परिवार का सबसे छोटा सदस्य 3 साल का मेरा बेटा भी कोरोना को ‘हउ’ नाम से जान गया था और बार- बार यही बोलता कि बाहर मत जाना… पुलिस मारती है । सभी समाज के लोग इस विपदा में गरीब- असहाय लोगों की मदद के लिए हर समय तत्पर थे जो मेरे शहर की संस्कृति के साथ मुझे गौरान्वित महसुस करवा रही थी । धन्यवाद…. बीकाणा….

नकारात्मक पहलू

यह ऐसा समय भी था कि मेरे पीहर वाले घर के पास कोरोना पाॅजिटीव आने से मैं लोकल बीकानेर होते हुए भी 2 माह तक घर नहीं जा सकी । जो अपने आप में हमारे संबंधों की दूरियों का बढ़ावा दे रहा था । इन दो महिनों में मेरी ताईजी व नानीजी व मामाससुर का देहान्त हो गया लेकिन मैं इस कोरोना की वजह से परिवार वालों के दुःख में शामिल नहीं हो सकी । जबकि ताईजी और नानीजी का मुझसे विषेष स्नेह था । यदि इस बीमारी की वजह से हमारे रिष्तें कमजोर होते है तो फिर सामाजिक या सोशल जीवन जीना ही व्यर्थ है । इस बीमारी की वहज से लाकडाउन होने पर प्राइवेट सेक्टर के लोगों को खूब आर्थिक नुकसान हुआ जिससे सभी अनजान थे… शायद जिसकी पूर्ति भी असंभव है ।

लेखिका – हेमलता व्यास