जीने की जद्दोजहद – मेरा कोरोना वर्ष अनुभव 34

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शशि मित्तल
करोना
,”बहुत ही प्यारा शब्द था पॉजिटिव
शायद इसको भी किसी की नजर लग गई ”
मुझे खास लिखना नहीं आता है फिर भी अपना अनुभव लिख रही हूं
करोना महामारी अभी तो सिर्फ ६महीने ही हुए है इसने हाहा कार मचाया हुआ है देखा लोगो का पायलान दो वक्त की रोटी के लिए भागते हुए किसी की तो दुनिया रुक गई जिनको मरने की भी फुर्सत नहीं थी वो फुर्सत में थे और एक तरफ रोटी के लिए जदोजहद चल रही थी पर हर इंसान ने एक दूसरे की मदद की इतने लंगर इतना अन्न बंटा लोगो ने जो बंटा वो सही हाथो मै गया क्युकी उनको पता था कोन जरूरत मंद है पर सरकार ने जो बंटा वो जातिगत आधार पे बंटा तो सही नहीं बंट पाया चलो छोड़ो ये बाते मेरी समस्या अलग थी बच्चे सब dr है अलग २ मुझ से बहुत दूर है बहुत चिंता रहती है सब कहते है की सेवा कर रहे है भगवान है पर मै मा हूं हर दम फिकर मंद रहती हू ओर चाहती हूं कि घर आ जाए लिखने को ओर भी बहुत कुछ।है पर बस इतना ही
लेखिका- शशि मित्तल