कैसी हो शिक्षा?

osho education ओशो शिक्षा

शिक्षा कैसी हो इस बारे में बहुत कम दार्शनिकों ने विचार व्‍यक्‍त किए हैं। यह बात अलग है किन इन दार्शनिकों ने परम्‍परागत शिक्षा ग्रहण नहीं की। आधुनिक भारत में जहां कुछ पिछडे हुए लोगों को उठाने के लिए आरक्षण की व्‍यवस्‍था की गई है वहीं अगडों में से भी अधिकांश के पास नौकरी और सुरक्षित भविष्‍य नहीं है।

राष्‍ट्रवादी संगठनों ने मैकाले को गाली दी और अपनी जिम्‍मेदारी से मुक्ति पा ली। कुछ संगठन और मिशनरीज स्‍कूलें भी चला रहे हैं ताकि बचपन में ही बच्‍चों को धर्म विशेष का बीज पकडा दिया जाए। ताकि बडे होकर वे सफेद, लाल, गेरूए या हरे वस्‍त्र पहनकर धर्मयुद्ध में कूद सकें।

फिर भी आज एक पिता को इस बात की चिंता रहती है कि उसके पुत्र का भविष्‍य क्‍या होगा। क्‍या वह अपने पैरों पर खडा हो पाएगा, क्‍या वह वायोलेंट होते समाज में अपने पैर जमा पाएगा, क्‍या वह प्रतिस्‍पर्द्धा में टिक पाएगा। उसे क्‍या बताया जाए कि वह सबसे आगे रहे। अक्षर ज्ञान प्राप्‍त कर चुके लोगों को भी यह पता नहीं कि अपने अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए या फिर आज की हमारी नैतिक जिम्‍मेदारी क्‍या है

किसी बच्‍चे को तार्किक और स्‍पष्‍ट सोच के लिए न केवल पढाई की बल्कि तर्कपूर्ण वातावरण की भी आवश्‍यकता होती है। 

सामान्‍य शिक्षा

दीक्षा की आलोचना करने वाले ओशो ने एक ही बात पर बल दिया कि शिक्षा ऐसी हो जो मनुष्‍य को सोचना सिखाए। जब तक मनुष्‍य खुद सोचना नहीं सीखेगा और दूसरे की सोच पर काम करेगा तब तक दुख पाएगा। ऐसे में किसी विद्यार्थी को गुरू क्‍या सिखा सकता है। इस बारे में ओशो कहते हैं कि सिखाओ मत देखो कि विद्यार्थी क्‍या सीखने को प्रवृत्‍त है। जैसा विद्यार्थी का रुझान हो शिक्षक को बडे भाई की तरह उसका मार्गदर्शन करना चाहिए। न कि बाप की तरह। ऐसे में सीखने के दौरान आने वाली बाधाओं को पार करने के अलावा अतिरिक्‍त स्‍वतंत्रता की संभावना बनी रहेगी जो विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास में सहायक होगी। ऐसा नहीं होने पर सिस्‍टम में पहले से तैयार हो रहे लोगों जैसा ही एक और मनुष्‍य आ खडा होगा। जो व्‍यवस्‍था से सांमजस्‍य बनाकर चलता हो और जीवनयापन करता हो।

गुरू की भूमिका के बारे में ओशो स्‍पष्‍ट करते हैं कि मारने या अन्‍य विधियों से भय पैदा करने से अगर चेला गुरू का कहना मानता है तो इसका कोई फायदा नहीं है। गुरू ऐसा होना चाहिए जिसके प्रति चेले के मन में स्‍वयं ही आदर पैदा हो। और ऐसा केवल प्रेम अनुराग से ही संभव है।