कुछ माल हमें भी दिला दो

Hindi online vs offline

बेचारे नेताओं के जी को भी कम जंजाल नहीं है। संचार क्रांति के युग में मीडिया का संक्रमण सोशल मीडिया और वेब पोर्टल पर हो रहा है। ऐसे में हर कोई ऐरा गैरा नत्‍थू खैरा किसी नेताजी के पास पहुंचता है, उन्‍हें अपने द्वारा चलाए जा रहे किसी “पप्‍पू के चुटकुले” टाइप का पेज और उस पर आ रहे लाइक कमेंट दिखाकर बताता है कि आपको भी अपनी रीच बढ़ानी है तो हमें इतने पैसे दो। जिस नेता की जितनी औकात है और मांगने वाले की जितनी कुव्‍वत है, उन दोनों में न्‍यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत भाव तय हो जाता है, और पप्‍पू के चुटकुले पेज को नेताजी के नाम से साथ कन्‍वर्ट कर जो ऊट पटांग पोस्‍टें ठेली जाती है, कि नेताजी को गालियां खाने के लिए अपनी खाल को और मोटा करना पड़ता है।

पुराने जमाने में यानी करीब दस बारह साल पहले इंटरनेट पर हिंदी लिखने वाले कुछ ब्‍लॉगर ऐसे भी थे जो पेशे से पत्रकार दलाल भी हुआ करते थे, वे भी इन चुनावों के मौसम में मेवा बटोरने नेताओं के पास पहुंच रहे हैं। अपने जान पहचान के दस बीस ब्‍लॉगरों की प्रोफाइल दिखाकर मोटा पैसा नेताजी से वसूल रहे हैं और ब्‍लॉगरों पर भी कुछ छींटे डाल रहे हैं। परिणाम यह हो रहा है कि बीस, पचास और सौ पेज व्‍यू वाले ब्‍लॉगर भी रोज की रोज हाय मोदी, ओय मोदी की पोस्‍टें लिख लिखकर हलकान हुए जा रहे हैं।

एक वरिष्‍ठ ब्‍लॉगर आहत हो गए, तो उन्‍होंने दूसरे ब्‍लॉगर को फोन करके इसके बारे में बताया, तो दूसरे ब्‍लॉगर ने स्‍पष्‍ट किया कि अरे पोस्‍टें लिखने का पैसा मिल रहा है, मेरे पास भी ऑ‍फर आया था, मेरे पास न तो टाइम है, न मैं मोदी विरोधी हूं, सो मैंने तो मना कर दिया, जिस समूह की आप बात कर रहे हैं, वे सभी मोदी विरोधी ही हैं।

मुझे सूचना मिली तो सिर पीट लिया, अरे दलालों कुछ मेरी तरफ भी तो देखो, मेरे पास भी डंप हुए दो चार ब्‍लॉग हैं, रोज की चार पांच पोस्‍टें लिख सकता हूं, कोई लाख दो लाख मुझे भी दिला दो, नासपीटों…