अनियमित जिंदगी- मेरा कोरोना वर्ष अनुभव 28

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कोरोना काल का मेरा अनुभव एक आम के ढेर की तरह है। इस ढेर के कुछ फल, या कहूं कुछ पल बेहद मीठे ,कुछ खट्टे ,कुछ अध्पक्के, कुछ परिपक्व हुए तो किसी ने सड़े हुए आम सा नुक्सान का एहसास दिलाया।

वैश्विक महामारी व लॉकडाउन की घोषणा से शुरू हुआ यह काल शुरुआती रूप में सुकून भरा था ऐसा लग रहा था कि जैसे प्रकृति के साथ-साथ मुझे भी मेरा मन चाहा ठहराव मिल गया। जहां मेरा जीवन घड़ी की सूइयओ से नियंत्रित नहीं हो रहा था। कोरोना काल से पूर्व अगर मैं निश्चित समय पर ना जागू तो ,मेरी बिटिया को समय पर स्कूल भेजने से लेकर नाश्ते ,व मेरे कार्य स्थल पर पहुंचने का पूरा चक्कर गड़बड़ा जाता और घर आकर भी ग्रह कार्य से लेकर सामाजिक मेल मिलाप व अन्य जिम्मेदारियों में पूरा दिन कब निकल जाता पता ही नहीं चलता फिर रात को 9:30 बजते ही सोना होता ताकि अगले दिन चक्र समय पर घूमे । लेकिन अब अलसाई सुबह, मन का सुकून, ना कहीं पहुंचने की दौड़ और ना ही समय से होड.।

इस बीच मैंने अपनी भूली बिसरी प्रतिभाओं जैसे लेखन, नृत्य आदि को चमकाया ,आ सखी चुगली करें मैं अपनी भागीदारी को बढ़ाया पाककला में भी अपना लोहा मनवाया भूले हुए यार- दोस्तों, रिश्तेदारों से फोन के माध्यम से मेलजोल बढ़ाया घर का कोना कोना चमकाया और अपना पहला महीना बिताया।कहते हैं ना कि “अति हर चीज की खराब होती है।”तो जी हमारे शहर में भी कोरोना ने दस्तक दे दी और महाकर्फ्यू की घोषणा के साथ शुरू हुई दैनिक जरूरतों की पूर्ति की जद्दोजहद व किफायत से राशन का प्रयोग करने की मजबूरी ।

अब सभी का ध्यान न्यूज़ पेपर और न्यूज़ चैनलों में रोगियों की बढ़ती संख्या के ऊपर था ।डर वह अवसाद का माहौल चारों और घिर आया था। अब यह आम अति पक्क चुके थे, यानी सड़ गए कोरुना नाम का रोग रक्तबीज की तरह फैलता जा रहा था और हमारे दायरे सिमट रहे थे लोगों की नौकरियां, रिश्तो वह मानसिक तनाव सभी के लिए चुनौती बनता जा रहा था। मास्क व सैनिटाइजर जीवन के अभिन्न अंग बन गए।

सदी के महानायक से लेकर मजदूर वर्ग इसके आगे बेबस व त्रस्त हो गए । डॉक्टर व पुलिस वाले भी इस बीमारी से लड़ते-लड़ते रोग ग्रस्त हो गए।जिन नियमों को व बातों को आधुनिक जीवन शैली ने मजाक बनाया जैसे घर आकर हाथ पांव धोना ,हाथ जोड़कर अभिवादन करना ,योग व आयुर्वेद बच्चा बच्चा भी उसी की अहमियत मान रहा था। राम-कृष्ण, चाणक्य जैसे पौराणिक पात्रों को जान रहा था। ऐसा लगता है कि प्रकृति ने जैसे रीसेट बटन दबाया है और हमें वापस अपनी पुरानी सेटिंग्स पर जाकर अपना जीवन शुरू करना पड़ेगा।

लेखिका- पद्मा  जोशी