तुम्हें जाग्रत होना है

you have to awaken Dr Skand Shukla

भीड़-भरी दुनिया में आगे बढ़ने के लिए खलनायक चुनने से अधिक सावधानी नायक चुनने में करनी है।

पाश्चात्य , आधुनिक और जाग्रत — तीन विशेषण हैं , जिनके भँवरों में लोग घूम-घूम कर चक्कर खाते हैं। हर पाश्चात्य बात आधुनिक नहीं है , हर आधुनिक बात पाश्चात्य नहीं। हर पाश्चात्य जाग्रत नहीं है , हर आधुनिक भी जाग्रत नहीं है।

और हर जाग्रत क्या वह पाश्चात्य है ? या फिर क्या हर जाग्रत आधुनिक है ? है तो किस हद तक ?

पाश्चात्य वे बातें हैं जो भूगोल की परिधि में हैं। दुनिया के ‘उस’ हिस्से ने जो कुछ अच्छा-बुरा दिया है , वह पाश्चात्य है। ध्यान रहे , वहाँ का सब अच्छा नहीं है ! सो पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान भी है , पाश्चात्य लोकाचार भी है , पाश्चात्य जीवन-निर्वहन भी है। आधुनिकता की परिभाषा वह तय करता है , जो वर्तमान को खेता है। समय एक नदी है और सभ्यता एक नाव। सो चूँकि पाश्चात्य सभ्यता की नाव का आधुनिक खेवनहार है , इसलिए वह आधुनिक भी है।

वर्तमान में वर्तमान-जैसा रहना आधुनिकता है। आज का रहन-सहन , आज का फैशन , आज का पैशन , आज का भोजन , आज का नियोजन — सब आधुनिक बनाते हैं आपको। आज के होते जाइए , आधुनिक के तमगे चिपकाते जाइए।

लेकिन फिर तीसरा विशेषण जाग्रत है। जगना न भूगोल सिखा सकता है , न वर्तमान। जगना समय पर सोने से आता है। 

आप लॉस एंजेलेस में रहकर पाश्चात्य हो सकते हैं , आधुनिक भी हो सकते हैं , जाग्रत फिर भी सम्भवतः न हों। आप धाराप्रवाह अँगरेज़ी बोलकर पाश्चात्य भाषाई संस्कार परिलक्षित कर सकते हैं , फटही जींस पहनकर आधुनिक भी नज़र आ सकते हैं , लेकिन फिर भी गहरी नींद में हो सकते हैं। दरअसल जहाँ से आपकी सतह ख़त्म होती है , वहाँ से मैं आपको कुरेदूँगा। और बता दूँगा कि आप पाश्चात्य-आधुनिक होकर भी सोते क्यों रह गये।

मेरा बेटा मेरे साथ फ़िल्में देखता है। रामायण में उसे नायक-खलनायक के चुनाव में समस्या नहीं आती : राम और रावण में पर्याप्त भेद कथाकार ने रखे हैं , जिससे बच्चा भी अपना चुनाव कर सकता है। लेकिन फिर मैं उसे कृष्ण-पौण्ड्रक की कहानी में ले जाता हूँ। लड़का घूम जाता है। पौण्ड्रक का स्वरूप एकदम कृष्ण-सा है। मेरे बेटे को ऐसे नज़दीकी चुनावों की आदत नहीं है।

मगर बात यहीं ख़त्म नहीं होती। मेरे बेटे ने अभी चिरस्थापित नायकों को उनके आदर्शों के आधार पर नहीं , उनके गेटअप और डायलॉगों के आधार पर चुना है। और ऐसा करने वाला मेरा बेटा एकलौता नहीं है : संसार के ढेरों लोग बड़े हो ही नहीं पाते , वे गेटअप और डायलॉगों के आधार पर अपने नायक चुनते जीवन बिता डालते हैं।

वर्तमान के नायक-खलनायक एक ही हैं , अलग-अलग नहीं। बल्कि एक ही व्यक्ति में दोनों बसते हैं। तो मुझे अपने बेटे को आदमी में से आदमी छाँटना सिखाना पड़ेगा। लेकिन फिर मैं भी ज़माने के साथ बीतता चला जाऊँगा। इसलिए उसे यह मनुष्य से मनुष्य बीनना एक समय के बाद स्वयं करना होगा।

आदमी में आदमी की परख विज्ञान देता है और नीति देती है। दोनों जहाँ मिलते हैं , उसी चौराहे पर सारे नायक हैं। उसी चौराहे पर जागृति है। तुम्हें पाश्चात्य नहीं बनना है , न आधुनिक बनना है। तुम्हें जाग्रत होना है।

जागृति अपने पोषण के लिए पश्चिम और वर्तमान से जो लेने लायक समझेगी, ले लेगी। बाक़ी सब बाज़ार की सड़ी-गली सब्ज़ी है।


Dr Skand Shukla पेशे से Rheumatologist and Clinical Immunologist हैं। वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं और अब तक दो उपन्‍यास लिख चुके हैं

 स्‍कन्‍द शुक्‍ल

लेखक पेशे से Rheumatologist and Clinical Immunologist हैं।
वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं और अब तक दो उपन्‍यास लिख चुके हैं