गुजरात चुनाव पर मेरा दो कौड़ी का मत

Gujarat-Election-2017 two penny thought

गुजरात चुनाव पर मेरा दो कौड़ी का मत Two penny thought on Gujrat election

गुजरात जीत को अगर बीजेपी अपनी जीत मान रही है तो मुगालते में है, गुजरात हार को अगर कांग्रेसी अपनी हार मान रहे हैं तो वे भी मुगालते में हैं…

मुद्दा पहले भी हिंदुत्‍व था, आज भी हिंदुत्‍व है, मोदीजी जिस रथ पर सवार होकर दिल्‍ली पहुंचे हैं, दिल्‍ली वालों ने उस रथ का कोना पकड़ लिया है…

वाजपेयीजी को सेक्‍युलर चेहरे के साथ तीन बार ताजपोशी करानी पड़ी, तब भी इंडिया ने शाइन नहीं किया, क्‍योंकि वास्‍तविक समस्‍या विकास नहीं, विकास अपनी स्‍वाभाविक गति से चल रहा है, उसके लिए बाजार, इंजीनियर, वैज्ञानिक पहले भी काम कर रहे थे और आज भी काम कर रहे हैं।

असल समस्‍या तुष्टिकरण थी, जो राजनीति में भारी असर करती है। वाजपेयीजी के बाद आडवाणीजी सेक्‍युलर हुए और सत्‍ता के करीब भी नहीं आ पाए…

अगर मोदीजी का आडवाणीकरण हुआ तो परिणाम बहुत अधिक घातक हो सकते हैं।

बहरहाल सनातन पहले भी जीता था, आज भी जीता है, दोनों पार्टियों को उनकी औकात बताते हुए जीता है।

अगला चुनाव धोती, चोटी और मंदिर पर ही होगा… डंके की चोट पर होगा।


हारपून जानते हैं हारपून…

समुद्र के भीतर बड़ी मछलियों पर गोली तो नहीं चला सकते, ऐसे में एक बंदूक का आविष्‍कार किया गया, जो स्प्रिंग सिस्‍टम पर चलती है और उसमें आगे की ओर एक भाले जैसा हथियार लगा होता है, लीवर खींचते ही भाला गोली की तरह निकलता है और खतरनाक जीव को भेद देता है…

इसकी समस्‍या इतनी ही होती है कि एक बार छूटने के बाद यह बेकार हो जाता है। मसलन शार्क ने हमला किया और आपने हारपून दाग दिया, तो यह अपने आप लौटकर तो आएगा नहीं और दोबारा लोड करने में समय लगता है। ऐसे में हारपून कब और कैसे छोड़ा जाए, इसके प्रति बहुत अधिक सजग रहने की जरूरत होती है।

मीडिया के पास यह हारपून था, उसे दिल्‍ली चुनाव में तबीयत से इस्‍तेमाल किया गया, ऐसी हवा बनाई कि चुनाव प्रचार के दौरान ही रवीश कुमार इतने कांफिडेंट हो चुके थे कि उन्‍होंने दिल्‍ली में आप सरकार बनने का मानो उद्घोष करना शुरू कर दिया था।

मीडिया को लगा कि यह हथियार तो हर बार इस्‍तेमाल किया जा सकता है, लेकिन यह भूल गई कि दिल्‍ली की यह जीत खुद मीडिया की साख के खर्च होने पर हासिल हुई है। हारपून छूट चुका था और अब इसके इस्‍तेमाल की वैसी क्षमताएं नहीं बची थी।

आज अगर रवीश पहले खुश और बाद में हताश मिले तो माना जा सकता है कि यह हताशा हथियार के निष्क्रिय होने का नतीजा है।


समय खराब हो तो ऊंट पर बैठे को भी कुत्‍ता काट लेता है, अब देखिए कांग्रेस का सबसे सॉलिड हथियार ही ईवीएम के हैक होने का था, लोगों ने इतनी सीटें दे दी कि कांग्रेसी समझ नहीं पा रहे कि थूक को पड़ा रहने दें या चाट लें…