मिथिला में शाक्त परंपरा

mithila naresh

मिथिला में शाक्त परंपरा खंडवाल कुल के पहले की है पाल राजाओ के काल से मिथिला का यह क्षेत्र घनघोर शाक्त रहा परम आदरणीय वामाचार का मुख्य केन्द्र।

जब खंडवालो के प्रथम मुखिया महेश ठाकुर यहां आये तो वे भी इस शाक्त परंपरा के पोषक बने यह प्रवत्ति अंतिम महाराज कामेश्वर सिंह तक रही।

मछली यहां की सहज उपज थी सो वह सम्पूर्ण मिथिला मे मुख्य आहार रहा और शाक्त दर्शन मे उसके होने से वह धर्म और लोक दोनो मे खूब वरेण्य हुई।

खंडवाल नरेशो ने मिथिला में और केवल संस्कृत पाठशाला खुलवायीं। दरभंगा का राजवंश सबसे पहले प्रसिद्धी मे आया महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह के समय। वे बहुत विद्वान और विद्याव्यसनी नरेश थे रॉयल एशियाटिक सोसायटी कलकत्ता के सदस्य के रूप मे अनेकों पुस्तकें छपवाकर जनसामान्य को सुलभ कराई उन्होंने। उनके जनहितकारी कार्यो के कारण कलकत्ता वासियो ने अपने खर्चे पर उनकी प्रतिमा कलकत्ते मे स्थापित की।

उनकी मृत्यु के बाद उनकी गद्दी पर बैठे उनके छोटे भाई महाराधिराज रमेश्वर सिंह बहादुर। उस समय के सर्वाधिक शिक्षित नरेशों में से एक महाराज भी रॉयल एशियाटिक सोसायटी के सदस्य थे। वायसराय की सलाहकार समिती के एकमात्र भारतीय सदस्य। उच्च कोटी के शिक्षाविद्, कई स्कूल और कुछ कॉलेज उन्‍होंने स्थापित किए, अनेकों दुर्लभ पुस्तकें छपवाई, शिक्षा सुलभ कराई आमजन को, कई बड़े पुस्तकालय खोले गए।

बेहतरीन प्रशासक, उनके समय मे दरभंगा के प्रशासन की तुलना नही थी। गांव गांव में डाक व्यवस्था से लेकर पुलिस तक सब चाक-चौबंद रहता था। दूरदर्शी उद्योगपति उनने और उनके बाद उनके पुत्र महाराज कामेश्वर सिंह ने कई उद्योग धंधे कारखाने दरभंगा स्टेट मे स्थाप्त किए। रेलवे लाइन , हवाई अड्डा, गंगा नदी मे कलकत्‍ते तक चलने वाली नौका यातायत सब व्यवस्थित किए गए। और उनका वह भाग जो निजी था और हमारे लिये सर्वाधिक आदरणीय वे अपने समय के मूर्धन्य शाक्तोपासक थे।

कंकाली या गुह्यकाली खंडवाल कुल की कुल स्वामिनी रही हैं। अतः यह परंपरा से शाक्त थे, परंतु महाराज केवल नाम के शाक्त ना रहे साधन मे इतने डूब गये की कलकत्ता उच्चन्यायालय के न्यायाधीश के पद को इसलिये अस्वीकार करे की उससे उनकी नित्य प्रातःकाल की अर्चन मे बाधा आती थी।

कलकत्ता हाईकोर्ट के तत्कालीन जज आर्थर एवलोन या सर जान वुडरफ उनके मित्र थे महाराज के प्रभाव मे आकर हिन्दू धर्म स्वीकार किया और घोर साधना करके ठाकुर शिवचन्द्रविद्यार्णव सरीखे शिव स्वरूप गुरू के शिष्य हुए। उनकी लिखी अनेकों पुस्तकें शाक्त और हिन्दू धर्म की निधि है।

लेकिन बहुत कम लोग ये जानते हैं की सरजॉन वुडरफ की प्रथम दीक्षा महाराज रमेश्वर सिंह द्वारा हुई थी अपनी कुलस्वामिनी के मंत्रोपदेश महाराज ने वुडरफ को दिया था। दोनों मित्रों ने मिलकर कितने ही दुर्लभ ग्रंथो को छपवाया जो आज के इंडोलॉजी अध्ययन करने वालो के शिरोमणी ग्रंथ हैं।

पटियाला नरेश महाराज भूपिन्दर सिंह रमेश्वर सिंह जी के मित्र थे और बारिश के समय दरभंगा घूमने आये थे। वहां कमला नदी में आई बाढ़ के समय महाराजा रमेश्वर सिंह की ऐसी शक्ति का दर्शन करने पर वे उनके अनन्य भक्त बन गए और उनने अपनी राजधानी पटियाला मे काली मंदिर बनवाया जो अद्यतन वहां स्थापित है और पुजारी मिथिला से लेकर गए।

महाराज रमेश्वर सिंह द्वारा निर्दिष्ट अनुष्ठान कराने पर उनको बहुत दिनो से प्रतीक्षीत अपने उत्तराधिकारी की प्राप्ति हुई जो यदुविन्दर सिंह के नाम से जाने गये जिनके पुत्र केप्टन अमरिन्दर सिंह वर्तमान मे पंजाब के मुख्यमंत्री हैं। जब महामना मालवीय बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी के स्थापना हेतु धन उगाही कर रहे थे, तब उनको सर्वाधिक योगदान धन के रूप मे करने वाले महाराज रमेश्वर सिंह ही थे।

महाराज असल मे धर्मावतार थे उनते वैलक्षण्य के कारण तत्कालीन शंकरो ,काशी विद्वत परिषद और भारत धर्म महामंडल ने उनको “राजर्षि ” की उपाधि दी। पर सबसे सुंदर चीज जो सम्पूर्ण मिथिलांचल ने अपने प्रिय नरेश को महती विरूद दिया कहावतके रूप मे जो अन्यत्र दुर्लभ था। उनकी प्रजा ने कहा…

“मिथिला मे दो ही राजा हुये पहले थे जनक (सीरध्वज) दूसरे महाराज रमेश्वर सिंह”

जब इसे पढ़ा तो कालिदास कृत रघुवंशम् मे महाराज दिलीप के लिये लिखा श्लोक याद आ गया

“प्रजानाम विनयाधानात रक्षषणादभरणादपि
सः पिता पितरस्तासां केवलम् जन्म हेतव”

(अशुद्ध संस्कृत हेतु क्षमा करे गुरूजन)

अर्थ हुआ “वह प्रजा का शिक्षण करता था ,पालन और रक्षण केसाथ असल मे वही पिता था बाकी उनके जैविक पिता तो केवल प्रजा के जन्म के हेतु थे”

जब महाराज ने शरीर छोड़ा था तब उनके दाह स्थान पर उनके सुपुत्र महाराजश्री कामेश्वर सिंह ने काली मंदिर बनवा दिया महाराज रमेश्वर सिंह की इष्ट श्यामा काली के नाम से जो बहुत प्रसिद्ध है। दरभंगा की जनता आज भी अपने प्रिय नरेश की चिताभूमी पर बने मंदिर को पूज्य मानती है। यह परंपरा नई नहीं है। शाक्त परंपरा मे किसी महान साधक के दाहोपरांत उस स्थल पर उसके इष्ट की प्रतिमा स्थापित करवा दी जाती है मिथिला, अंग से लेकर बंगाल आसाम त्रिपुरा तक ये परंपरा देवी प्रतिमाओ के रूप मे और शांकर मत मे शिवलिंग के रूप मे दक्षिण से लेकर उत्तर तक विद्यमान है।


Avinash Bhardwaj Sharma

लेखक : अविनाश भारद्वाज शर्मा