…तो हम सूर्य के प्रकाश में नहाते और संसार का हर खाद्यान्न-संकट मिट जाता

Food from sunlight Solution to the problem of hunger

…तो हम सूर्य के प्रकाश में नहाते और संसार का हर खाद्यान्न-संकट मिट जाता Problem of hunger

‘कोई मिल गया’ में नीला एलियन जादू सूर्य के प्रकाश से शक्ति पाता है। फ़िल्मकार उसे पौधों की तरह अपनी ऊर्जा का निर्माता दिखाते हैं। यह निर्माता की सोच बताता है : प्राकृतिक रूप से सर्वाधिक स्वावलम्बी होना सर्वाधिक शक्तिशाली होना भी है। जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार प्रकाश से भोजन-रूपी पदार्थ बना लेना है।

दुनिया की ढेरों समस्याओं में एक बड़ी समस्या भूख की है। वह जो देह के होने का भान कराती है , वह जो तन के लिए तरह-तरह के भोज्यों की माँग जताती है। यही कारण है कि संसार का हर देहधारी भूखा है और पूरा जीवन भूख के शमन-जागरण से गुज़रते हुए काट देता है।

पौधे संसार के सबसे मौलिक स्वपाकी लोग हैं। वे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं , किसी से लेते नहीं। वे सूर्य के ज्योति का प्रयोग करके वायुमण्डल से कार्बनडायऑक्साइड और पानी की रासायनिक अभिक्रिया करा देते हैं , जिससे ग्लूकोज़ बन जाता है। यही भोजन का प्राकृतिक संश्लेषण है , जिसे प्रकाश-संश्लेषण भी कहा जाता है। पौधों की कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट नामक अंगक होते हैं , जिनमें एक हरा रंजक क्लोरोफ़िल होता है। क्लोरोफ़िल इस ग्लूकोज़-निर्माण की प्रक्रिया में बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

संसार के सारे जानवर दरअसल भोजन के लुटेरे हैं। वे स्वयं भोजन नहीं बना सकते , वे होटलबाज़ी करते हैं। वे पौधों को खाकर उनसे उनका भोजन ले लेते हैं। पौधे अमूमन स्थिर हैं , वे भाग नहीं सकते। नतीजन वनस्पतियों को खाने और उनसे आहार पाने की यह प्रक्रिया पृथ्वी पर बहुप्रचलन में है।

लेकिन पौधों को खाने के लिए उन्हें उगाने की समस्या है। खेती में श्रम है , वह एक परावलम्बी काम है। फ़सल हुई तो ठीक , न हुई तो हाहाकार। ऐसे में क्या यह बेहतर न होता कि हम-लोग भी पौधों की तरह हरे-भरे होकर अपना भोजन छतों-मैदानों-सड़कों पर बना लेते ?

हँसिए नहीं। विज्ञान में जो इच्छाओं पर हँसते हैं , वे सबसे बन्द लोग हैं। सारी आवश्यकताएँ आविष्कारों की जननियाँ हैं , लेकिन जनक तो जीव ही है। जीव और आवश्यकता जब प्रणय करते हैं , जब आविष्कार गोद में किलकारी भरता है।
तो हर कोशिका के दो अंगकों पर आकर बात ठहरती है : पहले क्लोरोप्लास्ट जो प्रकाश-संश्लेषण करते हैं और पौधों में पाये जाते हैं व दूसरे माइटोकॉण्ड्रिया जो पौधों-पशुओं , दोनों में मिलते हैं। माइटोकॉण्ड्रिया निर्मित हो चुके ग्लूकोज़ को तोड़कर उससे ऊर्जा का निर्माण करते हैं। सूक्ष्मतः क्लोरोप्लास्ट में भोजन बनता है , माइटोकॉण्ड्रिया में खाया-पचाया जाता है।

ऐसा माना जाता है कि लाखों वर्ष पहले ये क्लोरोप्लास्ट-माइटोकॉण्ड्रिया स्वतन्त्र जीवाणु-जैसे जीव थे। हमारे पुरखों ने इन्हें अगवा कर लिया। कहा कि हमारे भीतर रहो। तुम्हें भी जगह मिलेगी रहने को। सम्मान भी मिलेगा। कहाँ समुद्र में खारे पानी में इधर-उधर डोलते हो ! न जीवन का ठिकाना , न भोजन का!

तो क्लोरोप्लास्ट-माइटोकॉण्ड्रिया उन नन्हीं कोशिकाओं के भीतर ले लिये गये। यह एक आन्तरिक सहअस्तित्व का अनुबन्ध था। तुम मुझमें आ जाओ और हम एक-दूसरे की भूख और सुरक्षा का भार उठा लें। वही क़रार पहला हरा जीव था।

तब से अब तक हमारा समाज बहुत आगे आ चुका है। तरह-तरह के पेड़-पौधे , किस्म-क़िस्म के जानवर पनप चुके हैं। लेकिन माइटोकॉण्ड्रिया अपनी कोशिकाओं के भीतर होने के बाद भी क्लोरोप्लास्ट हममें नहीं है। हम अपना भोजन बना नहीं सकते , सिवाय कुछ अपवाद-स्वरूप जानवरों के।

अगर मैं-आप अपनी पूरी त्वचा को हरा कर भी लें , तो भी जो ग्लूकोज़ बना सकेंगे वह आवश्यकता के हिसाब से बहुत थोड़ा होगा। हम पौधों की तरह एक ही जगह जमे नहीं रहते , चलते-फिरते हैं। अपने समस्त कार्यकलापों को करने के हमें किसी टेनिस-कोर्ट की सतह जितनी त्वचा चाहिए होगी।

पौधा होना आसान नहीं है, त्याग का सर्वोत्तम सौभाग्य है । सूरज सभी से ऐसे हरे-भरे अनुबन्ध नहीं करता।


Dr Skand Shukla

स्‍कन्‍द शुक्‍ल

लेखक पेशे से Rheumatologist and Clinical Immunologist हैं।
वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं और अब तक दो उपन्‍यास लिख चुके हैं