नामित एंग्‍लो इंडियन लोकसभा प्रतिनिधि

Nominated Anglo Indian Representatives in Lok Sabha

नामित एंग्‍लो इंडियन लोकसभा प्रतिनिधि Nominated Anglo Indian Representatives in Lok Sabha

सहिष्‍णु भारतीयों के साथ हमेशा से ही दोहरा मजाक होता रहा है। क्‍या आप जानते हैं हमारे देश में एक ऐसी मान्‍योरिटी है जिसकी आबादी चार लाख बताई जाती है और उसके लोकसभा में दो नॉमिनेटेड प्रतिनिधि होते हैं। कल्‍पना कीजिए यह कम्‍युनिटी कौनसी हो सकती है।

मैं जानता हूं कि अधिकांश मित्र इसका जवाब नहीं दे पाएंगे, कुछ समय पहले तक मेरे लिए भी यह दुर्लभ जानकारी थी, लेकिन पिछले दिनों भाजपा सरकार ने सोलहवीं लोकसभा में 14 महीने तक इन दो नॉमिनेशन को रोककर रखा और उसके बाद दो लोगों की नियुक्ति की, तब खबर बनी कि सरकार मान्‍योरिटी को लेकर कितनी क्रूर है।

च‍लिए पहेलियां बुझाना बंद करता हूं, और आप खुश होइए कि हमारे देश में आजादी के 68 साल बाद भी एंग्‍लो इंडियन कम्‍युनिटी है, हम इतने गए गुजरे हैं कि इन सालों में भी एंग्‍लो इंडियन को भारतीय नहीं बना पाए, जबकि इनकी संस्‍था के अनुसार इनकी संख्‍या चार लाख तक पहुंच चुकी है। इन एंग्‍लो इंडियंस के लिए हमारी लोकसभा में संविधान के आर्टीकल 331 के तहत दो प्रतिनिधि राष्‍ट्रपति द्वारा नामित किए जाने की सुविधा है।

अब दो बातें सामने आती हैं, पहली तो यह कि इस प्रकार कम्‍युनिटी के आधार पर और कितने समुदायों को लोकसभा में प्रतिनिधित्‍व दिया गया है। अगर हर चार लाख की आबादी पर दो प्रतिनिधि भेजे जाते रहें तो 120 करोड़ की आबादी वाले भारत की लोकसभा में केवल नामित सदस्‍यों की संख्‍या ही 6 हजार को पार कर जाएगी।

दूसरी बात यह कि जब इस समुदाय के लोगों को मताधिकार प्राप्‍त है तो चार लाख लोगों को मिलकर अपना कम से कम एक प्रतिनिधि तो चुनकर भेज देना चाहिए, इस प्रकार के नॉमिनेशन की प्रक्रिया क्‍या समानता के अधिकार का उल्‍लंघन नहीं है।

देश में बाकी सभी समुदाय जहां रहते हैं, वहां के स्‍थानीय प्रतिनिधि को चुनकर लोकसभा में भेजते हैं, फिर एंग्‍लो इंडियंस (?) को यह विशेष सुविधा क्‍यों दी गई है?

वर्तमान 16वीं लोकसभा भी संविधान के ऐसे ही प्रावधानों से बंधी है, तो आइए सरकार झेलते हैं दो एंग्‍लो इंडियन लोकसभा प्रतिनिधियों को इनमें एक का नाम है रिचर्ड हे जो केरल से हैं और दूसरे हैं जॉर्ज बेकर बंगाल से।

अब सवाल यह भी है कि इन दोनों को नामित करने में इतनी देरी क्‍यों हुई, क्‍या भाजपा को अपने अनुकूल दो एंग्‍लो इंडियन खोजने में इतना समय लग गया, जबकि बंगाली बेकर तो भाजपा के ही हैं।