इंसेप्‍शन – सपनों की रहस्‍यमयी दुनिया

Inception - Amazing world of derams Movie review

इंसेप्‍शन – सपनों की रहस्‍यमयी दुनिया Inception – Amazing world of derams

इस फिल्‍म को लेकर पहली भसड़ ये होती है कि दर्शक कहता है कि क्‍या माजरा है कुछ समझ में ही नहीं आया। मैं भी अपवाद नहीं हूं, आउट ऑफ द बॉक्‍स फिल्‍म के साथ ऐसा होना अटपटा भी नहीं है। खैर, अपने आहत अहम को लेकर मैंने ये फिल्‍म कोई दस बार शुरूआती दौर में ही देखी, बाद में अब भी कभी कभार देख लिया करता हूं। कोई फिल्‍म पसंदीदा को तो ही केवल देखी जाए, यह जरूरी नहीं, कई बार मेरी कुंठा भी मुझे फिल्‍म देखने के लिए मजबूर करती है।

लौटते हैं फिल्‍म पर…

एक झेन साधू सुबह सुबह उठते हैं और बुरी तरह रोने लगते हैं, आश्रम में मौजूद चेले दौड़ते हुए आते हैं और पूछते हैं कि क्‍या हुआ गुरूजी क्‍यों स्‍यापा मचा रखा है, तो गुरूजी बताते हैं कि मैं अभी अभी सपना देख रहा था कि मैं तितली बना हुआ हूं और फूलों के रस चूस रहा हूं, तभी आंख खुल गई। तो चेलों ने कहा कि इसमें क्‍या बड़ी बात हो गई। तब गुरुजी ने कहा कि तय नहीं कर पा रहा हूं कि ये सपना है या वो सपना था।

अरे, यह मत समझिए कि यह कथा फिल्‍म की कहानी का भाग है, फिल्‍म और इस कहानी में साम्‍यता मात्र सपने और सच्‍चाई में भेद समाप्‍त हो जाने की स्थिति है। हम केवल उतनी ही कल्‍पना कर सकते हैं,‍ जितना कि हम जानते हैं। जब तक किसी जानकारी का स्रोत हमारे पास न हो तो उसके प्रति कल्‍पना करना लगभग असंभव है। ऐसे में अगर किसी व्‍यक्ति को किसी विशिष्‍ट निर्णय तक पहुंचाना हो तो उसके दिमाग में विचार शृंखला के आधारभूत माल की तरह क्रमबद्ध तरीके से सूचनाओं को पहुंचाना जरूरी है। फिल्‍म में यही दिखाया गया है, शुरूआत में ही कॉब यानी हमारा हीरो स्‍पष्‍ट कर देता है कि मैं सबकांशिसयनेस में दखल करता हूं, क्‍योंकि सबसे खतरनाक चीज विचार ही है। विचार बदल गए तो निर्णय भी बदल जाएंगे, इससे हम किसी से भी कोई भी काम करवा सकते हैं।

इस अवचेतन में उतरने की विधि कॉब और उसका मित्र ऑर्थर किसी मिलट्री प्रोग्राम से चुराकर लाए होते हैं। अब केवल दिमाग के भीतर घुस जाना ही पर्याप्‍त नहीं होता, उसके भीतर वृहद् संसार होता है। अब चूंकि बहुत ही नियंत्रित तरीके से विचार को भीतर प्रवेश कराना है तो पूरा वातावरण भी नियंत्रित होना चाहिए। इसके लिए कॉब लिबरिंथ की सहायता लेता है।

लिबरिंथ को आप भूल भुलैया की तरह समझ सकते हैं, अंतर केवल इतना होता है कि आप भूल भुलैया में खो जाते हैं और लिबरिंथ पैटर्न आपको सैकड़ों रास्‍तों के बावजूद केन्द्र में पहुंचने तक का रास्‍ता ही बाकी रखता है। यानी सपने को इस प्रकार डिजाइन किया जाए कि जिस व्‍यक्ति को सपने के भीतर ले जाया जा रहा है, वह किसी भी सूरत में उस विचार से भटके नहीं।

सपने में समय कुछ लंबा हो जाता है, सामान्‍य समय की तुलना में हम अधिक लंबी कहानी जी लेते हैं, अगर सपने के भीतर सपना हो तो कहानी और लंबी हो जाएगी और अगर सपने के भीतर सो रहा व्‍यक्ति सपना देखे और उस सपने में तीसरे स्‍तर का सपना हो तो समय अवधि सालों तक लंबी हो सकती है। ऐसे में सपने के भीतर कहानी बुनने में कम समय में अधिक स्‍पेस मिल जाता है।

समस्‍या यह है कि अगर सपने में कोई व्‍यक्ति मर जाता है, तो असल जिंदगी में वह कोमा में चला जाएगा, क्‍योंकि अवचेतन निष्क्रिय हो चुका होगा और चेतन मस्तिक के पास कोई पल्‍स नहीं आएंगे।

कहानी के अनुसार कॉब की समस्‍या यह है कि पूर्व में अपनी पत्‍नी के साथ वह एक लंबा समय, यानी सपने के कुछ दशक, यानी मौजूदा जिंदगी के कुछ साल, जिन्‍हें वह सपने के दशकों के रूप में जी चुका है। इससे पत्‍नी की अवचेतन कंफ्यूज हो जाता है और वह सत्‍य और सपने में भेद नहीं कर पाती है, अंतत: वह ऊंची बिल्डिंग से छलांग लगाकर आत्‍महत्‍या कर लेती है। भले ही भौतिक रूप से मर चुकी हो, लेकिन कॉब के अवचेतन में वह चिरस्‍थाई हो जाती है।
यही गड़बड़ होती है कि कॉब जो भी लिबरिंथ बनाता है, उसमें अवचेतन में मौजूद उसकी पत्‍नी लूप होल्‍स बना देती है और सपना प्रभावित होता है। ऐसे में कॉब एक नई लड़की को लिबरिंथ बनाने के लिए तैयार करता है। अब टॉस्‍क यह है कि एक विश्‍व की नम्‍बर एक तेल कंपनी का मालिक मरने वाला होता है और उसके बेटे के दिमाग में यह विचार डालना है कि वह किसी भी तरह तेल कंपनी समाप्‍त कर दे।

बाकी कहानी आप देखिए कि कैसे यह सब होता है…