प्रकृति को समझने का ढंग

Idea of nature

क्योंकि वर्ड्सवर्थ और आइंस्टाइन के लिए ‘प्रकृति’ शब्द के मायने अलग-अलग होंगे (या शायद नहीं होंगे जिस स्तर के वे मूर्धन्य हैं!) …

“‘नेचर’ शब्द कभी ओल्ड-फैशन्ड नहीं होगा , क्योंकि सारा फैशन नेचर से निकला है “, मैं अपने मित्र से कहता हूँ।

“अच्छा ! और ये फैक्ट्रियाँ ! ये गैजेट्स ! ये सब क्या दिन-दिन प्रकृति का ह्रास नहीं करते जा रहे ?” वे उत्तर देते हैं।

यह संवाद इस क्षण विज्ञान और कला की पारम्परिक परिभाषा के बीच ठहर जाता है। या यों कहें कि ज़्यादातर लोग जिस तरह से विज्ञान और कला को परिभाषित करते हैं , वहाँ पर आकर थम जाता है।

विज्ञान में आकार-आकृति की गढ़न अधिक है। ऐसा नहीं है कि वह अस्थिरता-अनिश्चितता को स्थान नहीं देता , ख़ूब देता है। लेकिन फिर भी वह किंचित् नियमों-निर्देशों के अनुसार आगे बढ़ता है। दूसरी ओर कला में नियमों का ज़ोर कम चलता है। नयी कला तभी पनपती है , जब वह पुराने मानदण्डों पर चढ़कर नवीन छलाँग लगाए। बल्कि कला परिभाषाओं के झमेले में पड़ना ही नहीं चाहती , अपरिभाषित रहकर सर्जना करना उसे सुहाता है।

लेकिन फिर भी कुछ सामान्यताएँ ज़रूरी हैं। इसलिए विज्ञान में ‘प्रकृति’ और कला में ‘प्रकृति’ पर चर्चा भी। कला में जो भी कुदरती है , वह प्राकृतिक है। जो मानव-निर्मित नहीं है , जो मानवेतर है , जो मानव से बड़ा है — वह सब कुछ। लेकिन विज्ञान में सभी कुछ प्रकृति है। यानी मानव-मानवेतर का कोई भेद ही नहीं। आप प्रकृति ने परे हैं ही नहीं। आपका सेलफ़ोन भी उतना ही प्राकृतिक है , जितने कि आप। सब प्रकृति के ही रहस्य हैं , चाहे वे मानव से बनाये हों अथवा पाये हों।

लेक डिस्ट्रिक्ट में रहते समय विलियम वर्डस्वर्थ ने वहाँ से रेल की पटरी के गुज़रने पर तीव्र प्रतिरोध जताया था। कारण कि अगर वहाँ से रेलगाड़ियाँ गुज़रेंगी तो कुदरत का एकान्त भंग होगा। वे रूमानी कविमना थे , उन्हें मशीन की छेड़छाड़ हरगिज़ नहीं पसन्द थी।

लेकिन फिर भी रेलगाड़ी वहाँ पहुँची। मनुष्य ने हर जगह प्रकृति से छेड़छाड़ की। उसने अपनी सायास हिस्सेदारी कुदरत के साथ करनी चाही। सब कुछ प्रकृति का , लेकिन बनाया मनुष्य ने। या यों कहें कि मनुष्य द्वारा प्रकृति ने।

तो भेद कहाँ है मुझमें और मित्र में ? बल्कि कोई भेद है भी ? भेद मात्र छेड़छाड़ का है। प्रकृति के रहस्यों को जो जितना कम-से-कम छेड़े और टच-मी-नॉट के ढंग से निहारता , भीतर उतारता रहे , वह हुआ कलाकार। लेकिन जो छेड़कर कुछ भी नया करना चाहे भौतिक जगत् में , वह हुआ वैज्ञानिक।

छेड़ना ज़रूरी है , नहीं भी है। प्रकृति को एकदम उसके हाल पर छोड़ना नियतिवाद है। नियतिवाद से फिर धर्मवाद है , जातिवाद है , नस्लवाद है , लिंगवाद है। नियतिवाद में ईश्वरीय सत्ता की पुष्टि है।

सारा सार झंकार पैदा करने में है : कितना करोगे कि स्वर गूँजेंगे। ज़्यादा से कर्कशता उपजेगी और कम से संगीत मौन को भेद न सकेगा। बुद्ध याद आये आपको? प्रकृति को समझने का ढंग वहाँ से जानिए।

बच्चे माँओं को बच्चों की तरह छकाते अच्छे लगते हैं, उससे अधिक नहीं।


Dr Skand Shukla पेशे से Rheumatologist and Clinical Immunologist हैं। वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं और अब तक दो उपन्‍यास लिख चुके हैं

 स्‍कन्‍द शुक्‍ल

लेखक पेशे से Rheumatologist and Clinical Immunologist हैं।
वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं और अब तक दो उपन्‍यास लिख चुके हैं