हमें जीना है और तुक्के मारने हैं : डार्विन और विकासवाद – 13

Darwin and His Theory of Evolution and conflicts

जब हम जीव-विकास की बात करते हैं , तो हमारा चिन्तन-बिन्दु जनसंख्या होती है , व्यक्ति नहीं।

बदलते पर्यावरण के कारण डीएनए में होने वाले सूक्ष्म बदलाव पहले होते हैं , जो माइक्रोइवॉल्यूशन कहलाते हैं। फिर जब वे बहुत से हो जाते हैं तो पूरा जीव ही किसी नये जीव में तब्दील हो जाता है। यह मैक्रोइवोल्यूशन है और इसमें करोड़ों साल लगते हैं।

आदमी आदमी से जुदा है। आदमी पैदा होता है , बढ़ता है , बीमार पड़ता है , मरता है। आदमी ही आदमी का कई बार भला करता है , उसका बुरा भी करता है। एक पीढ़ी के आदमी से दूसरी पीढ़ी के आदमी का पैदा होना दो लोगों के मेल से नयी गढ़न का बनना है। यह दूसरा आदमी दूसरे लिंग का है और यह यह गढ़न-प्रक्रिया यौनकर्म है।

सेक्स के मूल में विषमताओं की उत्पत्ति है अन्यथा हमें स्त्री और पुरुष नहीं चाहिए। अमीबा की तरह बँटते चले जाओ , या फिर कटो-फटो तो पाँच भुजाओं वाली तारामीन की तरह नये जीव बना लो। लेकिन यौन में जटिलता है। उसकी हम क़ीमत देते हैं। उसके लिए हमें लम्बी-चौड़ी तैयारी करते हैं। परिपक्व होते हैं , फिर प्रजनन होता है। इसलिए बहुत सारे संसाधनों का व्यय है। और यह व्यय इसलिए ज़रूरी है कि अगली पीढ़ी हमसे बेहतर और मज़बूत हो। सर्वाइवल ऑफ़ द फ़िटेस्ट’ के मूल में यही धारणा है।
एक आदमी कुदरत के लिए मायने नहीं रखता। इकाई के लिए वह सोच ही नहीं सकती। वह बहुवचन में बात करती है , उसके लिए छिपकली नहीं छिपकलियाँ हैं। उसके लिए भैंस नहीं , भैंसें हैं। उसके लिए बारहसिंघा नहीं , बारहसिंघे हैं। वह सम्पूर्ण स्पीशीज़ के जीनों के बदलाव के अनुसार उनकी छँटनी कर रही है , किसी एक पर बिना ममता-क्रूरता छिड़के बिना।

प्रकृति का यह रवैया हमें बताता है कि हम क्या हैं। आदमी आदमी-सा क्यों है , खरगोश-सा क्यों नहीं। पीपल पीपल-सा क्यों है, आम-सा क्यों नहीं। इन बातों के ढेरों जवाब हम जानने लगे हैं , लेकिन उससे भी ज़्यादा ऐसे हैं जो हम खोज रहे हैं।

आदमी आदमी-सा इसलिए है कि उसकी कोशिकाओं में आदमी वाले जीन हैं। ये जीन डीएनए के खण्ड हैं। इन जीनों यानी डीएनए से मिलकर गुणसूत्र बने हैं। इन्हीं जीनों के कोडों द्वारा प्रोटीन बनते हैं। ये प्रोटीन ही शरीर के सारे काम करते हैं। यह प्रोटीन-निर्माण कोशिकाओं के भीतर होता है। प्रोटीन वहीं बनते हैं , लेकिन काम भीतर-बाहर अलग-अलग ज़रूरतों के अनुसार करते हैं।

शुक्राणु अण्डाणु-सा क्यों नहीं है ? यकृत की कोशिका ( हिपैटोसाइट ) हृदय की कोशिका ( कार्डियोमायोसाइट ) की तरह क्यों नहीं है ? जब आदमी माँ के पेट में एक कोशिका था , तो इतनी अलग-अलग तरह की कोशिकाओं का पुलिन्दा कैसे बनता चला गया ?

क्योंकि कुदरत ने कुछ जीन ऑन किये , कुछ ऑफ़ किये। इस ऑन-ऑफ़ के पीछे तात्कालिक पर्यावरणीय ज़रूरतें थीं। हृदय की कोशिका की ज़रूरतें हृदय वाली , यकृत की कोशिका की यकृत वाली। वही पर्यावरण के अनुसार सूक्ष्म जीन-बदलाव , जिन्हें माइक्रोइवोल्यूशन कहा गया। फिर ये बदलाव मिलकर इतने अधिक हो गये कि एक स्पीशीज़ दूसरे से एकदम अलग दिखने लगा। आदमी आदमी-सा , खरगोश से एकदम जुदा।

जो विकास कोशिका के भीतर घटता है , माइक्रोइवॉल्यूशन कहलाता है। बाद में बहुत से माइक्रोइवॉल्यूशनों के जमा हो जाने से, मैक्रोइवॉल्यूशन हो जाता है और नयी जीव-प्रजाति अस्तित्व में आ जाती है।

परम्परावादी माइक्रो-बातों के लिए आपसे बहस नहीं करेंगे , वे मैक्रो-बातों को लेकिन नहीं स्वीकारेंगे। ये ही उनके हास्यास्पद दोहरे मानदण्ड हैं।


Dr Skand Shukla पेशे से Rheumatologist and Clinical Immunologist हैं। वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं और अब तक दो उपन्‍यास लिख चुके हैं

स्‍कन्‍द शुक्‍ल

लेखक पेशे से Rheumatologist and Clinical Immunologist हैं।
वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं और अब तक दो उपन्‍यास लिख चुके हैं