हमें जीना है और तुक्के मारने हैं : डार्विन और विकासवाद – 11

Darwin and theory of evolution and conflict

जीवन एक कक्षा में प्रवेश है , जिसमें आपको सालाना इम्तेहान देकर उत्तीर्ण होना है – ऐसा अनेक धार्मिक मान्यताएँ कहती हैं।

कई धर्मग्रन्थ मानव-जीवन को कर्मयोनि के रूप में निरूपित करते हैं , तो कोई मनुष्य को अदन के बाग़ीचे के निष्कासित बताता है , जो बिना प्रभुकृपा से क़यामत के दिन स्वर्ग नहीं पा सकता। मैं अलग-अलग धर्मों की मान्यताओं की परस्पर विवेचना में नहीं पडूँगा : कारण कि एक को दूसरे पर चुनने का किसी के पास कोई कारण नहीं है। जो जिस धर्म में पैदा हो जाता है , वह अमूमन उसी का राग गाते गुज़र जाता है।

डार्विन मनुष्य को असहाय करते हैं। वे ईश्वर की मान्यता से उसका हाथ छुड़ा देते हैं। वे बताते हैं कि मनुष्य इस लोक का सर्वश्रेष्ठ प्राणी सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि वह आज के पार्थिव पर्यावरण के अनुकूल है। कल को पृथ्वी बदल जाए , तो हो सकता है कि सर्वाधिक अनुकूल कोई दूसरा प्राणी हो जाए। किन्हीं परिस्थितियों में जीवाणु यहाँ के सर्वश्रेष्ठ प्राणी हो सकते हैं , किन्हीं में कोई पक्षी , जलचर अथवा सरीसृप।

डार्विन का मनुष्य एक कक्षा में प्रवेश पा चुका है , जहाँ उसे प्रतिदिन टेस्ट तो देने हैं लेकिन आगे किस कक्षा में प्रमोट होना है , पता नहीं। पता नहीं प्रोमोट होना भी है , अथवा नहीं। डिमोट भी होना पड़ सकता है। पढ़ाई छूट भी सकती है।
यह सत्य बड़ा भयावह है कि आप रोज़ अपने पर्यावरण से संघर्ष में हैं। आप के भीतर डीएनए रोज़ न जाने कितने ही आघात-प्रतिघात झेलता बदल रहा है। वह बेहतर हो रहा है , कभी बदतर हो रहा है। इन सभी को लिये आप जी रहे हैं। फिर इन बदलावों के साथ अपना डीएनए अगली पीढ़ी को दे रहे हैं।

बच्चा किसी रोग से ग्रस्त होता है , लोग पूर्वजन्म बीच में ले आते हैं। जो नास्तिक किन्तु अविज्ञानी हैं ( यानी वे अमिताभ बच्चन की फ़िल्म वाले ‘नास्तिक’ हैं , जो अपने ईश्वर से नाराज़ बैठे हैं ! ), वे ईश्वर को कोसने लगते हैं। लेकिन जब कदाचित् कोई है ही नहीं जिसने उस बच्चे को रोग दिया है , तब कोसने का क्या अर्थ ? रोग तो उस बच्चे के डीएनए और पर्यावरण के बुरे सम्मेल से उपजा है। अब इस असहायता के लिए किसे उत्तरदायी ठहराया जाए !

लक्ष्यहीन विकासवाद जो किसी निश्चित दिशा की ओर नहीं जा रहा , डरावना है। हम आगे भविष्य में क्या होने जा रहे हैं , नहीं जानते। हम कयास अवश्य लगाते हैं। कुछ लोग पढ़े-लिखे कयास लगाते हैं। ज़्यादातर अनपढ़ अपनी-अपनी धार्मिक किताबों में बताये भविष्य को चुपचाप स्वीकार लेते हैं।

प्रकृति को माता माना जाता है , लेकिन वह माता-जैसी कुछ नहीं है। उसे आपसे-मुझसे ममता नहीं है। ममता का एक गुण बहुत बड़ा आँचल होना भी है। अगर ममता होती तो वह इतने बड़े ब्रह्माण्ड में परिवार-नियोजन न करती। अब तक हमें नाना प्रकार के जीवन-युक्त ग्रह मिलते और तरह-तरह के जीव-जन्तु। हमारी रिश्तेदारियाँ बहुत बड़ी होतीं।

धर्म का सबसे बड़ा लाभ हर घटना को औचित्यपूर्ण सिद्ध करना है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इससे यह होगा। ऐसा करने से ऐसे हो जाओगे। इस काम का ऐसा फल मिलता है। हर बुराई पर अच्छाई की जीत होती है। और अगर बुराई पर अच्छाई न जीती तो ? तो फिर शाहरुखिया डायलॉग कि पिक्चर अभी बाक़ी है मेरे दोस्त !

पिक्चर मान लीजिए , नहीं बाक़ी है। बुराई भी अच्छाई पर जीत सकती है। अच्छे-बुरे की जीत-हार रैण्डम घटना है। दोनों धूसर हैं , कोई किसी से हार सकता है। हम किसी लक्ष्य की ओर कुछ बनने नहीं जा रहे। हम आज में जी रहे हैं , आज ही सत्य है। कल जो होगा , सो होगा।

समस्त सृष्टि मनुष्य के लिए नहीं बनायी गयी। इतना आत्ममोह किस काम का कि सौरमण्डल में नेप्ट्यून ग्रह भी हमारे लिए ‘किसी’ परमपिता ने बनाया ? बिलियनों आकाशगंगाएँ-तारे-ग्रह-उपग्रह क्या हमारे ही लिए रचे गये ?

दरअसल डार्विन से लोग डरते हैं , इसलिए उनपर विश्वास नहीं करते हैं। वे उस परम्परा के ज्ञानवान् मनीषी हैं , जो मनुष्य को एकाकी और तुच्छ सिद्ध करते हैं। वे उससे उसका बचपन छीनते हैं , कहते हैं कि बड़े हो जाओ। कब तक परीलोक की कहानियों से दिल बहलाओगे ! लेकिन आदमी डरपोक है। वह जानकर भी जानना नहीं चाहता। वह आस्था से सम्बल पाता है , उसे अँधेरे से डर लगता है।

जब-जब नैराश्य ज़ोर मारता है तो डार्विन से आगे की पीढ़ी में कोई नीत्शे जन्मता है। वह मनुष्य के शक्तिशाली होने का हिमायती है ( भीतर किन्तु स्वयं दरका हुआ है !) , इसलिए धर्मध्वंस की बात उठाता है। फिर इसी दर्शन का सूत्र पकड़कर कोई हिटलर नस्लवाद लिये विश्वविजय पर निकल जाता है। नतीजन किसी की सनक के लिए करोड़ों मनुष्य मारे जाते हैं। फिर कोई सार्त्र आता है और अस्तित्ववाद का मन्त्र उच्चारता है कि आदमी का एसेंस उसके वजूद से पहले नहीं तय हुआ। तुम जो बनते हो , वह पैदा होने के बाद तय करते हो। इसलिए किसी ईश्वर , किसी देवता , किसी राजा , किसी नेता के कहे अनुसार अपने-आप को न गढ़ो। और उसके बाद अगर ठगे जाओ , तो उसे मत कोसो। तुम जो हो रहे हो , स्वयं तुमने उसे चुना है। तुम चाहते तो कुछ और चुन सकते थे। तुम्हारा चुनाव बुरा था , तो कोई और उसका उत्तरदायी नहीं।

अन्त में मोहभंग होता है और कामू की उत्पत्ति होती है। जब न पाप है , न पुण्य , न कोई लॉजिक है संसार के चलने का और न किसी नियम से कोई फल मिलना है तो मनुष्य बस अपने आज के साथ निरर्थक जीवन जीने को अभिशप्त है। तो ऐसे में वह आत्महत्या क्यों न करे ?

आप देख रहे हैं न कि किस तरह अकेलापन और अनीश्वरवाद व्यक्ति को असहाय करते हुए खाई के एकदम समीप ले आता है। यहीं पर हमें मूर्खता से उम्मीदें हैं। बहुत ज्ञानवान् हो जाने पर नितान्त एकान्तिकता सताती है। कोई कुछ बाँटने के लिए उपयुक्त नहीं जान पड़ता। तो मनुष्य अपने दुःख को अपने सीने से लगाये किसकी शरण में जाए ?

अदन के बग़ीचे से निकाला गया वह नशे की गोद में जा बैठता है। महाप्रभु से हटकर अब वह मदिरालय में आसरा ढूँढ़ता है। सम्बल , सम्बल , कोई तो सम्बल दे !

परम ज्ञानी के लिए सम्बल सिर्फ़ एक होना चाहिए। अगर वह काल्पनिक परमेश्वर की आस्था से हट चुका है , तो उसे किसी नशे की तरफ नहीं जाना है। उसे साथी मानवों का हाथ थामना है। उनके साथ अपना सब कुछ साझा करना है।

आदमी को आदमी बनकर जीना है , आदमी का हाथ थाम कर आदमी की तरह मर जाना है।


Dr Skand Shukla पेशे से Rheumatologist and Clinical Immunologist हैं। वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं और अब तक दो उपन्‍यास लिख चुके हैं

स्‍कन्‍द शुक्‍ल

लेखक पेशे से Rheumatologist and Clinical Immunologist हैं।
वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं और अब तक दो उपन्‍यास लिख चुके हैं