हमें जीना है और तुक्के मारने हैं : डार्विन और विकासवाद – 20

Darwin and His Theory of Evolution and conflicts 25

फूलों के ब्याह का मौसम है और आइए इस ऋतु में चार्ल्स डार्विन की एक त्रुटि पकड़ें।

डार्विन ने जीव-विकास का अपना सिद्धान्त दिया। उसमें कहा कि प्रत्येक जीव-स्पीशीज़ पर्यावरण के अनुसार हो रहे बदलावों के अनुरूप स्वयं को ढालने का प्रयास करती है। जो ढाल पाते हैं , वे बेहतर जी पाते हैं। जीते हैं , इसीलिए प्रजनन कर पाते हैं। इस तरह से जातियों में बदलाव आते जाते हैं। नयी जातियाँ बनती जाती हैं। पुरानी जातियाँ जो पर्यावरण के अनुरूप नहीं ढल पातीं, नष्ट होती जाती हैं।

डार्विन के समय उन्हें डीएनए का पता नहीं। उनसे पूछिए कि अण्डाणु और शुक्राणु किस तरह से मिलकर नया शिशु बनाते हैं , वे नहीं जानते। बल्कि इस क्रिया को समझने के लिए वे पैनजेनेसिस का अपना मत रखते हैं। यानी नर और मादा के जिस्म का हर हिस्सा जेम्यूल नामक कण छोड़ता है , जो अण्डाणु और शुक्राणु में प्रवेश कर जाते हैं। इन्हीं कणों के आधार पर पैदा होने वाला बच्चा माँ-बाप के मिश्रित गुण लेकर जन्मता है।

लेकिन इस सिद्धान्त के साथ समस्या है। अगर कोई जीव पर्यावरण के अनुसार बदलाव पैदा कर रहा है , तो उसके जेम्यूलों में भी ये बदलाव हो जाएँगे। तो यक़ीनन फिर ये बदलाव उसके अण्डाणु-शुक्राणु में जाएँगे। तो फिर यह तो कुछ-कुछ लैमार्क का मत हो गया ! याद कीजिए कि लैमार्क ने ऐसा ही कहा था कि जिराफ़ अपनी गर्दन ऊँचे भोजन को पाने के लिए लम्बी करते जाते हैं। तो लम्बी गर्दनों से निकले जेम्यूल जिराफ़ों के अण्डाणुओं-शुक्राणुओं में गये और इससे प्रजनन के समय उनके बच्चे औसत लम्बाई वाले पैदा हुए। न कि ऊँचाई की माँग के अनुसार ऊँची गरदन वाले।

यह गुणों के औसतपने की समस्या है। नाटे आदमी की शादी लम्बी औरत से हुई। दोनों के जेम्यूल देह के कोने-कोने से निकले और क्रमशः शुक्राणुओं और अण्डाणुओं में प्रवेश कर गये। फिर नया शिशु बना। अब यह दोनों के गुणों के मिलने से औसत लम्बाई का होगा। यानी दो गुण वाले जीव जब प्रजनन करेंगे , तो उनके बच्चों में उनके गुण मिलकर औसत हो जाएँगे। लाल और सफ़ेद फूल वाले पौधों के फूल अब गुलाबी होंगे। गोर और साँवले व्यक्ति के बच्चे गेहुएँ होंगे। और फिर नर और मादा के प्रजनन से सारे बच्चे नर या मादा होने की बजाय इंटरसेक्स या नपुंसक क्यों नहीं पैदा होते ! यह भी तो दोनों के मिश्रण से हो सकता था !

चूहे की पूँछ कटी। इस पुँछकटे चूहे से सामान्य पूँछ वाली चुहिया से प्रजनन किया। सामान्य पूँछ वाली चुहिया के पूरे शरीर से जेम्यूल उसके अण्डाणुओं में पहुँचे लेकिन पुँछकटे चूहे के शुक्राणुओं में पूँछ न होने के कारण वहाँ के जेम्यूल नदारद रहे। नतीजन जब नन्हें मूषक-शिशु जन्मे , तो उनके औसत लम्बाई की पूँछें होनी चाहिए थीं। ऐसा भला कहीं होता है ! बकवास !

ब्लेंडिंग इन्हेरिटेंस डार्विनवाद के लिए एक शक्तिशाली आघात था। इसी के आधार पर फ्लीमिंग जेनकिन ने डार्विन के प्राकृतिक चुनाव के मत को ख़ारिज करने की कोशिश की। अलग-अलग गुणों वाले संग प्रजनन करेंगे और फिर उनके गुण प्राकृतिक चुनाव होने से पहले ही मिलकर औसत हो जाएँगे। अन्त में इस तरह कोई किसी से श्रेष्ठ या हीन नहीं रहेगा। तो गुणों के आधार पर कैसा चुनाव ? कैसा डार्विनवाद ?

आज हम जानते हैं कि डार्विन गलत थे। साथ ही गलत थे फ्लीमिंग जेनकिन। डार्विन का पैनजेनेसिस का मत ग़लत था। और जो पैनजेनेसिस को मानेगा , उसे ब्लेंडिंग इन्हेरिटेंस मानना पड़ेगा। इसलिए डार्विन अपनी ही बात से अपना ही विकासवाद कमज़ोर कर गये , जब तक एक बड़ा नया रहस्य नहीं खुला। इन दोनों की ये बातें तब तक विज्ञान-जगत् में बनी रहीं , जब तक वह पादरी अपने मटर के पौधों के साथ हमारे सामने नहीं आया। वह पादरी मेण्डल थे। अब बात मेण्डल की जिन्होंने डार्विन को स्घापित करने में बहुत बड़ा योगदान दिया।


Dr Skand Shukla पेशे से Rheumatologist and Clinical Immunologist हैं। वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं और अब तक दो उपन्‍यास लिख चुके हैं

स्‍कन्‍द शुक्‍ल

लेखक पेशे से Rheumatologist and Clinical Immunologist हैं।
वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं और अब तक दो उपन्‍यास लिख चुके हैं