हमें जीना है और तुक्के मारने हैं : डार्विन और विकासवाद – 19

Darwin and His Theory of Evolution and conflicts 24

“महाभारत के आदिपर्व में जब पाण्डव कुन्ती-समेत लाक्षागृह जाने को होते हैं , तो विदुर युधिष्ठिर से एक गहरी बात कहते हैं।”
“कौन सी ?”
“आग घास-फ़ूस और सारे जंगल को जला डालती है। परन्तु बिल में रहने वाले जीव उससे अपनी रक्षा कर लेते हैं। यही जीवित रहने का उपाय है। यदि शत्रु के इस दाव को कोई समझ ले , तो वह जीवित रह सकता है।”
“तो ?”
“तो युधिष्ठिर कहते हैं कि मैंने आपकी बात भलीभाँति समझ ली है।”
“तो ?”
“तो अब सुनिए कि रुडयार्ड किपलिंग अपनी कृति ‘द जंगल बुक’ में नायक मोगली से क्या कहलवाते हैं। वी बी ऑफ़ वन ब्लड , ये एण्ड आइ ! हम-सब एक रक्त-कुल के हैं , तुम और मैं !”
“तो ?”
“तो यह कि न आप व्यास को पढ़कर समझते हैं और न किपलिंग को। दोनों में डार्विनवाद और जीव-विकास का ध्वनन स्पष्ट है।”
“कैसे ?”
“चूहा अपनी रक्षा बदलती कुदरत के अनुसार इसलिए कर पाता है , क्योंकि वह उस समय सबसे अनुकूल जीव होता है। आग जब लगी होगी , तो चूहा बनना पड़ेगा। नहीं बन सकोगे , तो भुन जाओगे। चूहा यानी बिल बना सकने वाला। यही प्रकृति के अनुसार स्वयं को सफलतापूर्वक ढालना है।”
“और किपलिंग की बात ?”
“किपलिंग का साहित्य डीएनए से अनजान है। उस ज़माने में रक्त तक ही आदमी की पहुँच थी। एक ख़ून से आगे बढ़कर अब हम डीएनए से भी आगे आ चुके हैं। मोगली से वे कहलवाते हैं कि हम सब एक ही मूल एककोशिकीय जीव से निकले हैं। हम-सब एक ही कुल के बच्चे हैं। हम-सब एक ही कुरुवंश की सन्तानें हैं। फिर हम-सब महाभारत क्यों करते हैं ?”
“आप फिर व्यास के जयकाव्य में प्रवेश कर गये।”
“आपको लगता है कि विज्ञान लिखने वाले साहित्य की शैली में बात नहीं कर सकते ? जब भावनाएँ झगड़ा-फ़साद करा सकती हैं , तो वे प्रेम भी करा सकती हैं। शब्दों का तानाबाना बदलना भर ही तो है ! विज्ञान उस भाषा में आप तक अपनी बात पहुँचाने में सक्षम है , जिस भाषा में आप सुनना चाहते हैं। “
“डार्विन के चेहरे में कुछ तो बात है !”
“ललाट देखा है उनका ? रेखाएँ देखी हैं ? वह आदमी क्या साधारण था।”
“ऋषि ?”
“और तो क्या आपको लगता है कि ऋषि आधुनिक काल में नहीं जन्मते ? लेकिन किसी ऋषि पर अटकिए नहीं , आगे बढ़ते चलिए। अभी ढेरों ऋषि हर समय जन्मते रहेंगे। अटकने से अन्धभक्ति जन्मती है और अन्धभक्ति में विकासवाद नहीं है। युग के साथ सकारात्मक बदलाव ही विकास कहलाता है।”


Dr Skand Shukla पेशे से Rheumatologist and Clinical Immunologist हैं। वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं और अब तक दो उपन्‍यास लिख चुके हैं

स्‍कन्‍द शुक्‍ल

लेखक पेशे से Rheumatologist and Clinical Immunologist हैं।
वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं और अब तक दो उपन्‍यास लिख चुके हैं