जातिगत राजनीति और राष्‍ट्रीय गौरव

    Evolution of man fight facebook cover Cast Politics and national pride

    जातिगत राजनीति और राष्‍ट्रीय गौरव Cast Politics and national pride

    राजनीति करने वालों के समक्ष दो प्रकार के गोल होते हैं। शॉर्ट टर्म यानी चुनाव जीतने के लिए हर संभव साम दाम दण्‍ड भेद। दूसरे लांग टर्म यानी विरोधी को किस प्रकार रोककर रखा जाए और खुद का सेक्‍ट लगातार किस प्रकार बड़ा किया जाए।

    पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी राजस्‍थान में एक सभा को संबोधित करने वाले थे, इससे ठीक पूर्व राजस्‍थान के ही एक नेता ने उनके कान में फुसफुसाया कि भाजपा की सत्‍ता के कारण यहां बहुत विरोध है और जाट लॉबी विरुद्ध हो सकती है, यहां के वोटों को क्‍लीन स्‍वीप करने के लिए जाटों के लिए ओबीसी आरक्षण की घोषणा कर दी जाए तो मामला उलट सकता है। वाजपेयीजी ने घोषणा कर दी। परिणाम यह हुआ कि जाट जो कि शक्ति, सत्‍ता और धन के मामले में किसी भी जात से पीछे नहीं है, ने भाजपा को कितना वोट दिया यह तो स्‍पष्‍ट नहीं हो पाया, लेकिन ओबीसी पूरे हक से वसूली। वाजपेयीजी का शॉर्ट टर्म गोल राजस्‍थान की राजनीति को हमेशा के लिए बदल गया।

    बिहार में कुर्मी, उत्‍तरप्रदेश में चमार, यादव, गुजरात में पटेल और ऐसी ही अन्‍य जातियों को जाग्रत कर जातिवादी राजनीति को हवा दी जा रही है। हर बार शॉर्ट टर्म गेनिंग के लिए एक एक कार्ड खेला जा रहा है। ऐसा नहीं है कि यह शॉर्ट टर्म कार्ड रातों रात तैयार हो जाता है। सालों तक इसकी तैयारी करनी पड़ती है। आखिर में जमीन तैयार होने पर धावा बोलने के अंदाज में नेता पॉलेराइजेशन करने लगते हैं।

    लांग टर्म में भीतर ही भीतर एक बड़ा परिवर्तन आ रहा है, जो कि मोदी युग के उदय के लिए जिम्‍मेदार भी है और आगे भारतीय राजनीति में बड़े परिवर्तन का कारक भी सिद्ध हो सकता है। वह है राष्‍ट्रीय गौरव का उदय।

    भारतवर्ष के एक देश होने के पीछे अन्‍य देशों की तरह भौगोलिक सीमाएं, भाषा, चेहरा-मोहरा, सांप्रदायिक विचार जैसा एक भी बिंदू नहीं है, जो देश को एकसूत्र में बांध सके। देश के हर कोने में अपनी तरह के विशिष्‍ट लोग रहते हैं और सभी को अपनी श्रेष्ठता का भान भी है। इसके बावजूद शिक्षा व्‍यवस्‍था में हुए आमूलचूल परिवर्तन और भूख ने लोगों का आत्‍मगौरव छीन लिया और सभी समझने लगे कि भारत सोने की चिडि़या होने के काबिल भी नहीं था। जगह जगह दोयम दर्जे के कबीले धान उगाकर खाते रहे और एक दूसरे को नोंचते रहे।

    जातिगत राजनीति के कारण इस परसेप्‍शन में अब बदलाव आ रहा है। देश में कोई भी जाति ऐसी नहीं है जो कि आकाश से टपकी हो, हर जाति अपने भीतर एक परंपरा, एक संस्‍कार, एक लाइनेज लेकर चल रही है। हर जाति खुद को किसी न किसी ऋषि परंपरा से जोड़ती है। किसी न किसी देवता से जुड़ती है।

    तकनीकी काम करने वाले भारद्वाज गोत्र से जुड़ते हैं, इंट्यूशन या काउंसलिंग का काम करने वाले पाराशर से जुड़ते हैं, सेवा और कृषि जैसे कार्य करने वाले खुद को कश्‍यम ऋषि से जोड़ते हैं, ब्रह्मा से लेकर अंगिरा तक हर ऋषि और हर देवता किसी न किसी रूप में जातियों से जुड़ा हुआ है। अब चाहे वो ब्राह्मणों के परशुराम हो या क्षत्रियों के राम।

    जैसे जैसे जातिगत राजनीति हावी हो रही है, जातियों को अपनी श्रेष्‍ठता को सिद्ध करने के लिए उस अनछुए तार को छेड़ना पड़ रहा है, जिसे पश्चिमी अंधानुकरण ने नेपथ्‍य में धकेल दिया था। जैसे जैसे जातिगत राजनीति बढ़ेगी, ये भूले बिसरे तार फिर से जुड़ेंगे और अधिक शिद्दत से जुड़ेंगे। बहुत से लोगों को कुछ साल पहले तक अपना गोत्र नहीं पता होता था, आज लोग यह तक पता करने लगे है कि जाति का देवता और वेद में कौनसी शाखा उस जाति से जुड़ी है।

    ऐसा नहीं है कि सोशल इंजीनियरिंग वालों को इसका अहसास नहीं है, लेकिन वे इसका तोड़ नहीं निकाल पा रहे हैं। पूर्व में वामपंथियों के जरिए जब हमला बोला गया था, तब माओ, स्‍टालिन, मार्क्‍स जैसे नाम थे। उन्‍हें पूरा नहीं तो कम से कम हीरो की तरह पेश किया गया, क्‍योंकि केवल रिबेल की जरूरत थी और उस जरूरत को वे चेहरे पूरा कर पा रहे थे, लेकिन जातियों से ये किसी प्रकार जुड़ नहीं सकते।

    ऐसे में नया तरीका ईजाद किया जा रहा है, जिसमें किसी जाति को हिटलर तो किसी को सद्दाम से जोड़ा जा रहा है। कुछ दिन पहले मैंने एक पोस्‍ट के हवाले से बताया था कि सद्दाम को जाट बताया जा रहा है, मजे की बात यह भी रही कि 200 से अधिक लोगों में से करीब आधे लोगों के लिए यह मखौल का विषय था, उन्‍होंने स्‍माईली का रेस्‍पांस दिया। मैं मामले की गंभीरता को समझना चाह रहा था, लेकिन यह जानकर धक्‍का लगा कि इसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। इक्‍का दुक्‍का सक्रिय लोगों ने जरूर राजस्‍थान के आसन्‍न चुनावों और जातिगत राजनीति के लिए बोई जा रही विषबेल की ओर इशारा किया, बाकी लोगों के लिए नाग का यह फन भी हल्‍की मजाक भर ही है।

    राजस्‍थान के चुनाव शुरू होने वाले हैं, वर्ष 2007 में मैंने बहुजन समाज के महाराष्‍ट्र से आए लोगों का न सिर्फ इंटरव्‍यू किया बल्कि उनकी सभा में तब तक बैठा रहा जब तक उन्‍होंने मुझे लगभग धकेल कर निकाल नहीं दिया। उन्‍होंने तब समाज के लोगों में विष घोलना शुरू किया था, मैं वही उपस्थित था और नाम के साथ जोशी लगा था, सो वे बोलने में खुद को असहज महसूस कर रहे थे, सो उन्‍होंने मुझे उठाकर बाहर कर दिया।

    अब उत्‍तरप्रदेश में मायावती की जो कमर टूटी है, उसका खामियाजा किसी न किसी रूप में राजस्‍थान को मिलना तय है। दूसरी तरफ यहां की मुख्‍यमंत्री वसुंधरा राजे से अधिकांश लोग, चाहे वे नौकरशाह हों, व्‍यापारी हों, पावर ब्रोकर हों या आम जनता हो, सभी नाराज चल रहे हैं। आने वाले चुनाव में जाट, राजपूत, बहुजन समाज, मुस्लिम और ब्राह्मणों के खेमों के रूप में जातियों की ऐसी गंद मचने वाली है जो भूतो न भविष्‍यति साबित हो सकती है।

    अल्‍पकाल के लिए सनातन को कुछ नुकसान झेलना पड़ सकता है, लेकिन दूर तक देखा जाए तो जातिगत श्रेष्‍ठता का बोध अंतत: भारत को पुराना गौरव याद दिलाने का काम करेगा, जो अंतत: राष्ट्रीय गौरव के रूप में उभरेगा।