सुंदरता का पैमाना

जीनियस लियो नार्दो दा विंसी ने सुंदरता का पैमाना 1:768 जैसा कुछ बताया था। यानि किसी की शक्ल या शरीर में यह अनुपात परफेक्शन के करीब हो तो वह व्यक्ति सुंदर दिखाई देता है। फिल्म सितारे इस प्रकार की खूबसूरती या तो रखते हैं या‍ फिर इसके लिए कॉस्मेकटिक सर्जन की सहायता लेते हैं।

सुंदरता के दृष्टिकोण में खरे उतरने वाले इन सितारों को बहुत से लोग प्यार करते हैं। यानि बहुत ज्यादा लोग। बड़ी जनसंख्यां द्वारा प्यार किए जाने की अवस्था एक संकेत यह छोड़ती है कि कुछ तो ऐसा है जो फ्रायड या मेण्डाल के सिद्धांतों की पुष्टि करता है।

यहां एक और समस्या है। किसी औरत की जांघें या स्तंन तो यह सीधा संदेश देते हैं कि वह जनन अथवा पोषण में बेहतर हो सकती हैं। फिर कजरारी आंखें या तीखी नाक सितारों को लोगों का प्यारा कैसे बना सकते हैं। यानि कुछ ऐसा है जो प्रत्यक्ष शारीरिक लक्षणों के अलावा हमें सटीक चुनाव में मदद करता है। यह घने बाल, सुंदर आंखें, गोरा रंग और कई चीजें हो सकती है।

कई बार आर्यों पर, तो कई बार अंग्रेजों पर यह आरोप लगता है कि उन्होंने सुंदरता के मायने तय किए और आम भारतीय को यह सोचने पर मजबूर किया कि गोरा रंग और पुष्टय शरीर सुंदरता के पैमाने हैं लेकिन अंग्रेजों और आर्यों की बातों को छोड़ भी दिया जाए तो भी ये लक्षण तो रहते हैं ही और मेरा मानना है कि संकेत और उनका परिणाम भी उतना ही प्रबल रहता है। तो इस बार प्रेमियों का जोड़ा दिखाई दे जिसमें एक बहुत काला और दूसरा बला का खूबसूरत हो या इसका उल्‍टा तो आश्‍चर्य करने के बजाय यह देखने की कोशिश करिएगा कि इन प्रेमियों को करीब लाने में कौनसा फैक्‍टर काम कर रहा है।

(पैसे वाले फैक्‍टर को फिलहाल काउंट मत कीजिएगा।) 🙂

पिकासो
पिकासो ने एक सिद्धांत दिया था जिसमें उसने बताया कि हर चीज की सुंदरता उसके घटकों के सही अनुपात में होने से होती है। अगर यह अनुपात गड़बड़ा जाए तो सुंदरता कम हो जाती है।